शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

धोनी नाम कां शेर अब बुड्ढा हो रहां है..


महेंद्र सिंग धोनी विश्व स्तर के महान क्रिकेटर है. भारत के सबसे यशस्वी कप्तान रहें है. आज भी मैदान पर आधी कप्तानी तो वहीं करते दिखाई देते है. टीम कों उनकी जरुरत महसूस हो, ऐसा खेल कप्तानी, बॅटिंग और लाजवाब विकेट किपिंग से वह दिखातें रहें है. लेकिन जिस कारण से वे दुनिया में जाने जाते रहें है, वह 'फिनिशर' वाला तमगा अब उन्हें अब शोभा नहीं देता.
एक समय था जब धोनी मैदान में होतें तब तक जीत का विश्वास जिंदा
रहता था. वह भरोसा अब मॅच दर मॅच टूँट रहाँ है. धोनी अब उस श्रेणी में आ गये है, जहां एक महान खिलाडी बोझ बन जाता है.
इंग्लैंड से हारने के बाद धोनी के धीमे खेल को जिम्मेदार ठहराया गया. उनकी जमकर आलोचना हुई. उसी दरम्यान, वर्ल्ड कप के बाद उनके रिटायरमेंट की न्यूज जान बूझकर फैलाई गयी. खबर फैलाने वाले उनके दुश्मन रहें होंगे ऐसा लगता नहीं. धोनी सेमी फायनल और फायनल में धमाकेदार खेल दिखायें और भारत को कप दिलायें यहीं उद्देश उस खबर के पीछे रहां होगा. धोनी ने भागीदारी तो अच्छी निभाई लेकिन धीमे खेलने की उनकी बिमारी अब आगे भी क्युअर होने वाली नहीं है, यह संकेत फिर से दे दिये.

न्यूझिलंड के मॅच में भी वही हुआ.वे आखिर तक धीमा खेलते रहे. और ऐन मोकेपर उनका रन आऊट होना चमत्कार से कम नहीं था. भारतीय खिलाडियों को रनिंग बिटविन अपने उदाहरण से सिखानेवाला खूद रनआऊट हो गया. भारत की उम्मीदों पर पानी फेर गया. शेर अब बुड्ढा हो गया है, इसके यह संकेत दिखते है
पीछले कुछ वर्षो से उनका खेल ऐसा ही रहां है. अगर जीतने के लिये पाँच का रनरेट चाहिये तो वह रेट दस-बारह तक चला जाता है; लेकिन धोनी रिस्क नहीं उठाते. जब मॅच हाथ से निकल जाता है तब 49-50 वे ओवर में वे चौके-छक्के लगाते है. जिससे उनका स्थान तो टीम में बना रहता है लेकिन भारत हार जाता है. धोनी साथी को खेलने का ज्यादा मोका देते है यह बात सहीं है. लेकिन वह खूद सेट होकर भी रिस्क नहीं लेते. उसका दबाव दुसरे खिलाडी पर बनता है. रनरेट के दबाव में वे आऊट होते जाते है.
एक महान खिलाडी जो अभी भारतीय टीम के साथ है, रवी शास्त्री में भी धोनी की तरह सारी प्रतिभायें थी. शास्त्री के पास भी दो ही गीयर थे. वे भी बॅटिंग में रुद्रावतार धारण करने की क्षमता रखते थे लेकिन ज्यादातर इतनी धीमी पारियां खेलते कि भारत को हराकर ही दम लेते थे. उस जमाने में 150-180 का स्कोर बडा माना जाता था. लेकिन भारत तीन के रनरेट को भी हासिल नही कर पाता था. बाद में शास्त्री आते और मेडन पर मेडन ओवर निकालते. मानो कमजोर बॉल पर भी चौका मारते तो प्रलय आ जाता.धीमे खेल के कारण तीन का आस्किंग रनरेट 7-8 तक चला जाता और शास्त्री आऊट हो जाते. उस बोझ तले दबकर बचे खिलाडी हाराकिरी कर लेते. भारत हारता रहता. धोनी को वैसे ही खेलते देखकर शास्त्री को अपने दिन जरूर याद आते होंगे. इसमें कौन गुरू है यह तय करना मुश्किल है.
धोनी के लिये अधिक दुख होता है. क्यों की उन्होने भारत को जीतना सिखाया है. अब हरानेवाला धोनी ऐसा ब्लेम लगने के पहले उन्होंने वन डे क्रिकेट छोड़ देनी चाहियें. वैसे उनपर बेरोजगारी का वक्त तो बिलकुल भी आनेवाला नहीं है. आयपीएल वाले तो उन्हे मूँहमांगी किमत हर साल देते ही है. आगे भी देते रहेंगे. बीसीसीआई को भी उनकी चिंता है. किसी स्टँड को उनका नाम मिलना तो पक्का लगता है.
धोनी के खेल में वैसे कोई खोट नहीं है. वह खेल सकते है. लेकिन अब यह फार्मेट उनके काम का नहीं रहां है. असल में उन्हे उमर के लिहाज सें आ रही मर्यादाओं को ध्यान में रखकर 20-20 और वन डे फाॅर्मेट को छोड़ना चाहिये था. लेकिन बात उलटी हो गई है. उन्होनें टेस्ट क्रिकेट छोड़ दिया. इसी टेस्ट फाॅर्मेट के लिये वह आज भी ठीक है और बीसीसीआई उन्हे उमर के पचास साल तक भी 'खिला' सकती है. कोई दिक्कत नही है. धोनी का ब्रांड नेम अगले दस साल तक भी चल सकता है.
भारतीय क्रिकेट के लियें धोनी का योगदान अतुलनीय है. जहां हार ही हमारी किस्मत थी और टीम में स्थान बनायें रखना ही पुरुषार्थ था; ऐसे में एक छोटे शहर का युवा आता है खुद के बल पर चमत्कारिक खेल का प्रदर्शन करके एक से एक जीत दिलाता है. मरे हुये और केवल दांवपेंचों का अखाड़ा बने हुये भारतीय क्रिकेट कों उसने कप पर कप जितवाकर गौरव दिलवाया.आत्मविश्वास गवाँ चुकें टीम में जान फूँक दी. कई सिरीज़ जितवाई. विश्व कीं बड़ीं टीमों को कई बार पटखनी दी.
हार को आदत बना चुके भारतीय क्रिकेट को जीत की आदत दिलाने का श्रेय किसी खिलाड़ी को जाता है तो केवल धोनी ही है. लेकिन अब वक्त आ गया है किसी दुसरे को आगे लाने का. कोई महान खिलाडी खूद होकर टीम से बाहर होना नही चाहेगा. लेकिन कहाँ रुकना है इसका निर्णय-समय खिलाडी खूद तय कर ले तो उसके प्रतिष्ठा में चार चाँद लग जातें है. नहीं तो उसकी अवस्था दयनीय होने की संभावना ज्यादा होती है.
मॅनेजमेंट महान खिलाडी के नाते उसको टीम से निकाल नहीं सकती. तो उसको ढोना पडता है. यह क्रिकेट के लिये ठीक बात नहीं है. गावस्कर, कपिल, सचिन जैसे खिलाड़ीयों ने अपने खेल से करोड़ों क्रिकेट प्रेमीयों के मन पर कई साल राज किया. लेकिन वे भी रुकने का निर्णय नहीं ले पायें. खिलाडी की उमर चाहे कितनी भी हो जाये, फाॅर्म वापस आने की आस उसको लगी रहती है. आखिर उनको कई हथकंडे अपनाकर मॅनेजमेंट ने दूर किया. ऐसे महान खिलाडी टीम से बाहर गये तो भारत का क्रिकेट रुक थोडे ही गया? धोनी मिल ही गया. अब धोनी की भी बारी है. धोनी रास्ता खोल दो! पीछे कई खिलाडी धक्के मार रहें है.

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