शुक्रवार, 19 जून 2020

चीन के गुलाम आत्मनिर्भर कैसे बनेंगे ?

सभ्य लोगों की दुनिया मे 
धोखेबाज ड्रैगन
डर कां माहौल है। कोविड 19 कहर ढां रहां है। पुलिस, सरकारी यंत्रणा, स्वास्थ्य यंत्रणा दबाव में है। दबाव होगा ही, क्योंकि इतना काम करने का वक्त कभी
आयेगा यह सोचा नहीं था। अव्यवस्था काफी है। पेशंटस् बढते जा रहें है। सुधर नहीं रहां है।

 इंतजार हो रहां है कि कोई तो इलाज खोज लेगा। युरोप-अमरिका के पास सारे संसाधन है, पैसा है, उच्च कोटि के वैज्ञानिक है, फिर भी वह थक गए। भारत भी कोशिश कर रहा है। लेकिन हमेशा की तरह तरह जुगाड़ू इलाज से बात नहीं बनने वाली नहीं है। इलाज पक्का चाहिए। मोदी जी भी समझते होंगे। इसलिए उन्होने भी
कोरोना का प्रतीक
अब कोरोना पर पब्लिकली बोलना छोड़ दिया है। उनके एक समर्थक स्वामी रामदेव कोरोना पर दवा ले आए, लेकिन दवा लॉन्च होते से ही विवाद हो गया। दुनिया को चौंकाने का तंत्र अभी काम नहीं करेगा। पता नही लोगो को अभी  कितनी लंबी प्रतीक्षा करनी है।

प्रकृती भी खफा है। हलके ही सही भूकंप के धक्के इशारा दे रहें है। बीच में ही टिड्डीया आयी और किसानो कि फसल को नुकसान हुआ। यह तो प्राकृतिक संकट रहां लेकिन आदमी ही नही देशो के भी दिमाग खराब होते जा रहे हैं। धोखेबाज चीन को युद्ध की दुर्बुद्धी हो रहीं है।
पाकिस्तान की मित्रता कां
शायद चीन पर असर हुवा है; अन्यथा यह पत्थरमार पेटर्न चीनी जवानों में कहां से आ गया?

अबतक एलएसी पर चीन और भारत के जवानों में धक्कमधक्की देखी-सुनी गई थी। अब शस्त्र संधी कां पालन तो हो रहा है लेकिन पत्थर, डंडे, चाकू, रॉड से हमला करके जवानों को मार दिया जाए, ऐसा युद्ध समझ के बाहर है। चीन धोखेबाज, बेइमान है।

विदेश नीति तो आम आदमी के दिमाग के परे है। वह तो सरकार और उसके लोग ही जाने। लोग अपनी क्षमता से सोचते है। चीन आज गलवान वैली मे घुसा है, तब हमे उसके सामान पर बहिष्कार की बात सूझ रहीं है। चीन अपना
काम की बात
यहां बैठा है
चालबाज चीन
सामान लेकर दशकों से हमारे घर में घुसकर कब्जा जमा चुका है। अब अचानक उसके सामान पर बहिष्कार की बांत जोर-शोर से उठने लगी है।

भारत चीन से निर्यात की तुलना मे चार गुना आयात कर रहां है। भारत के लोगों को चीनी माल की चटक लग चुकी है। लगभग जरूरत की हर चीज सस्ते मे चीन से हमारे घर में पहुंच रहीं है।
 जो लोग आज आंदोलन कर रहे हैं वह भी उनकी ही वस्तुओं का इस्तेमाल करते हैं। सरकार लोगो को क्यों कहती हैं? इंपोर्ट कम करे। लेकिन देश में जो अरबों का चीनी माल पड़ा हुआ है उसका घाटा क्या व्यापारी उठाने को तैयार है? उद्योगपतियों का इतना सारा पैसा चीन से व्यापार में फंसा हुआ है। क्या उन्हें सरकार समझा पाएगी? तो फिर लोग जिनपिंग की अंत्य यात्रा निकालकर क्या संदेश दे रहे हैं?

कोरोना कां सच छुपाने के कारण चीन की दुनिया मे छी-थू हो रही है। युरोप- अमेरिका चीन पर खफा है।आएदिन चीन को सबक सिखाने की बातें हो रही है। उस पर आर्थिक निर्बंध लगना शुरू हो गया है। ऐसे में इतना बड़ा ग्राहकों का बाजार यानी भारत आत्मनिर्भरता की बात करें यह चीन को बर्दाश्त नहीं हो रहा है। दस देशों की आबादी भारत में बसती है। भारत चीन की बनी बनाई दुकान है। उससे वह खोना नहीं चाहेगा। इसी लिए दबाव बनाए रखना चाहता है। इसलिए उसकी खुराफात चलती रहेगी। कोरोना के इस संकट काल का मुहूर्त खोज कर चीन होशियारी कर रहा है। लेकिन हमारे जवान बॉर्डर पर मुस्तैद है। सीमा की रक्षा का तो वह संभाल लेंगे लेकिन क्या भारतीय आम आदमी उसमें हाथ बटाएगा, यह असली सवाल है।

 चीन को आर्थिक धक्का देने के लिए केवल व्यापारी ही नहीं आम लोगों को भी कुछ त्याग करना पड़ेगा।
आत्मनिर्भरता के नाम पर जो स्वदेशी को बढ़ावा देने की बातें हो रही है उसमें कितना दम है? हमारे व्यापारी तीन सौ रुपये कां एलईडी बल्ब बेच रहे थे, तब चीन तीस रुपये का बल्ब लाया था। हम इससे कैसे निपटेंगे? क्या चीन से निकली हुई कंपनियां सच में भारत में आ रही है? या दूसरे देशों में जा रही है? चीन अब केवल सस्ते माल के लिए ही नहीं अपितु क्वालिटी प्रोडक्ट के लिए भी जाना जा रहा है। क्या हम उससे स्पर्धा करने वाली चीजें पैदा कर पाएंगे? कई सारे सवाल है। लेकिन मोदी जी ने सर्वदलीय बैठक में चीन को ठीक करने का वादा किया है; उस पर देशवासियों को विश्वास करना चाहिए।

कोरोना भी चीन कां ही बच्चा है, पहले उससे तो दुनिया निपट ले। पहले उसे भगाना है। बाद में चीनी वस्तुओं का देखा जाएगा। तब तक दबाव की यह राजनीति चलती रहेगी। दुनिया चीन को डराएगी और चीन हमको। 140 करोड़ भारतीयों का बाजार उसे खोना नहीं है। उससे हम कैसे निजात पाएंगे?
मेड इन चायना
डिपेंडेंट भारत इंडिपेंडेंट कैसे बनेगा इसका गवाह बनने का मौका हमें मिले तो उससे बड़ा सौभाग्य दूसरा नहीं हो सकता। गुलामी से मुक्ती होगी तभी तो आत्मनिर्भर बनेंगे!










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