बुधवार, 8 जुलाई 2020

कोरोना वायरस की त्योहारों पर छाया ! तूम छुपे हो कहां...

चेहरा क्या देखते हो
चेहरा क्या देखते हो...
कोरोना वायरस ने लोगों की जीवनशैली को पलट कर रख दिया है। अभी अनलॉक का दौर चल रहां है। कामकाज रफ्तार पकड़ रहां हैं, लेकिन अनिश्चितता है कि कही फिर से लॉकडाऊन लौट ना आए। गती पकड़ते जीवन में वह जान नहीं है। अपनी ही धुन में तेज रफ्तार दौड़ती हुई दुनिया अब जैसे थम सी गई है। व्यवहार के तौर तरीके बदल गये है।
 अपनी शक्ल पर इतराने वाले आदमी का चेहरा ढक गया है। शक्ल को तरोताजा रखने के लिए लोग जाने कितना खर्चा करते हैं? आदमी, औरतें, युवा लड़के- लड़कियों और बच्चों तक को तरह की चेहरा चमकाने वाली फेस क्रीम की आदत पड़ चुकी है। लेकिन अब उसका यूज नहीं हो रहां है। शक्ल ही ढक रही है तो कौन क्रिम लगाए? फिल्म इंडस्ट्री, मॉडलिंग जैसे फील्ड का तो सारा धंदा ही चौपट हो गया है। ना कुछ फेअर दिख रहा है, ना कुछ लवली!

 हमारे कुछ लोकप्रिय नेता भी महंगे मेकअप करवाते है। लेकिन एक वायरस ने सबको चेहरा छुपाने पर मजबूर कर दिया है। स्वास्थ्य कर्मियों के तो सबसे बुरे हाल है। हमारा आधा चेहरा ढकता है तो दम रुकता है। उनका सारा शरीर घंटो ढका रहता है और कैसे हो पूछने वाला भी कोई नहीं। पिछले कुछ दिनों से इस सेवा से जुड़े हुए डाक्टर भूल चुके होंगे कि कब नार्मल पेहराव किया था। सबके शरीर ढके रहते है। चलो ठीक हुआ कि वायरस के खौफ से फिकी पड़ी चेहरे की रंगत छिप गयी। टमाटर जैसे गालों पर रुमाल ढक गया है। ढके चेहरे से अब केवल आंखें बोलती है। आंखों से जीने की चाह और दर्द भी झलकता है।

तूम छुपे हो कहां...

कोरोना के कारण सार्वजनिक तौर पर मनाए जाने वाले उत्सव बंद हो गए हैं। महाराष्ट्र में कई संस्था संगठनों ने इस
गॉड
साल गणेशोत्सव नहीं मनाने का निर्णय ले लिया है। दुर्गा उत्सव का भी शायद वही होगा। दिख रहा है कि इस वर्ष डांडिया से भी वंचित रहना पड़ेगा। डांडिया होगा भी तो मजा नही आएगा। युवाओं को बडा प्राब्लेम होगा। जिसका चेहरा देखना है उसे कैसे देख पाएंगे?

 महाराष्ट्र में आषाढी एकादशी के पर्व पर लाखो लोग उनके दैवत विठोबा के दर्शन हेतू पंढरपूर जाते है। गाव गांव से 'वारकरी' नाचते गाते 'दिंडी' के साथ विठोबा के दर्शन के लिए महिनाभर पहले ही पंढरपूर कूच करते है। रास्ते में
विठ्ठल
विठ्ठल
'गावकरी' भक्तो की सारी व्यवस्था का जिम्मा लेते है- स्वयंस्फूर्ती से। लाखो लोगो के इस मेले का कोई इव्हेंट मॅनेजमेंट नहीं होता। ना ही पुलिस को ज्यादा दखल देनी पड़ती है। यह अपनी तरह का बडा सात्विक उत्सव है।  अपने आप डिसिप्लीन चलता है। भक्तीभाव का यह पर्व पहली बार हो न सका।

वारकरी बडे दुखी है। वैसे इस उत्सव के पीछे की पौराणिक कथा सबको पता है। आषाढी एकादशी को भगवान सो जाते है। अब भगवान कार्तिकी एकादशी को उठेंगे। फिर वहीं उत्सव होता है। लेकिन शायद उस उत्सव का भी भरोसा नहीं है। अभी तो शुरुआत हुई है। आगे त्योहारों की लड़ी लगने वाली है। एक दुसरे घर खाने-पीने, प्रसाद का मौका चूक जाएगा। पता नहीं त्योहार कैसे मनाएंगे? देशभर घर के चौखट के बाहर अनेक उत्सव मनाए जाते है। कोरोना भी जोरो पर है। रोज के 25 हजार। उसका दायरा फैलता ही जा रहा है। कब रुकेगा यह सब?  क्या भगवान सच में सो गये है?

 भक्तो के उत्साह पर कोरोना की काली छाया पड़ गयी है। कोरोना लोगो की जान और त्योहार भी खाए जा रहां है। इसीलिए लोग में निराशा की
बाप्पा
भावना है। कहां गया भगवान? ऐसे सवाल गुस्से में पूछे जा रहे है। कुछ लोग उसके अस्तित्व पर ही शंका उपस्थित कर रहें है। संकट में दिमाग चलना बंद हो जाता है।

 गलत किया हमने ही। खूब कुत्ते, बिल्ली, चमगाधडो को मारकर खाया। जब वायरस फैला और लोग मरने लगे तब जानकारी दुनिया से छुपाई। गलती आदमी की है और दोष भगवान को देते है। चीनी तो भगवान मानते ही नही। उन्होने कोरोना दिया और उसे अपने देश में फैलने से रोक दिया। हम नियमो का पालन नहीं करेंगे और पकड़ेंगे भगवान को। उसका काम तो ठीक ही चल रहां है। लेकिन ज्यादातर लोग कुछ अलग सोचते है। इस वायरस से जितने लोगों की मृत्यू हुई है वह आंकड़ा दुनिया की आबादी के आगे बिलकुल नगण्य है। दुनिया के लगभग आठ सौ करोड लोग अभी जिंदा है यह किसकी कृपा है, ऐसा सोचकर खूद को पॉझिटिव रखने वालो कि तादात ज्यादा है। भगवान पर शक कर सकते है लेकिन फिर खूद पर तो भरोसा कर ले ?
दिल सच्चा और चेहरा झूठा...
दिल सच्चा और चेहरा झूठा...

सोमवार, 29 जून 2020

योगगुरू स्वामी रामदेव की जय हो...

थोडा रुक जाते तो अच्छा होता
थोडा रुक जाते!
हमारे प्रधानत्री मोदी जी को उनके समर्थको ने विश्वगुरु मान लिया है। दूसरी ओर हमारे बाबा स्वामी रामदेव विश्व में योगगुरु का सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। इसमें पहली बात विवादित हो सकती है, लेकिन दूसरे दावे में बेशक दम है। मोदी जी विश्व गुरू बने हो या नही लेकिन वे योगा के भक्त हैं इस संदर्भ में कोई विवाद नहीं है।

मोदीजी को योगा पसंद हैं और योगगुरू स्वामी रामदेव  मोदी जी को पसंद करते हैं। शायद योगा का ही धागा रहा होगा, इसीलिए दोनो के आपस में अच्छे संबंध है। दोनो में सबसे बडी समानता यह है कि वे माहौल बनाने में माहिर है। लोग दोनों से ही बड़ी उम्मीदें लगाए रखते है क्योंकि उनके सपने और दावे बड़े होते हैं।

दवा मिली, नहीं मिली!

खास तौर पर भारतीय लोगों ने कोरोना की आहट से लेकर अभी तक मोदी जी और बाबा जी से बड़ी उम्मीदें पाल कर रखी थी। लग रहा था दोनों मिलकर इस संकट का रामबाण जरूर निकालेंगे। कुछ जुगाड़ तो होकर ही रहेगा! दोनों के प्रति जुडी श्रद्धा के कारण लोग इंतजार करते रहे। आखिरकार अचानक एक दिन दुनिया को कोरोना की दवा मिल गई, नहीं दे दी गयी। बाबाजी ने अपने जादुई पोतडी से एक कीट निकाल कर दुनिया के सामने रख दिया। डाक्यूमेंट्स का पता नहीं चला और तुरंत दवा का असर उतर गया। विशेष यह हुआ कि मोदी जी की आयसीएमआर ने दवा को पहचानने से ही इनकार कर दिया। इसके कारण बाबा जी की निराशा हुई, यह उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। बडी चीज कां शगून ठीक नहीं हुआ।

कोरोना विश्व के लाखों लोगों को निगल गया है। वैक्सीन के लिए दुनिया अरबों रुपए और समय खर्चा कर रही है। भारत में भी हजारों लोग करोना की भेंट चढ़ चुके हैं और आजतक 5 लाख से ज्यादा लोग उसकी चपेट में आए हैं।  सारी दुनिया उपाय के पीछे लगी है। ऐसे में जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ। बाबा जी ने 15 दिन पहले से ही चैनलों पर योगा के पाठ सिखाना शुरू कर दिया था। तभी कुछ शक हो रहा था कि बाबा कोई धमाका तो नहीं करेंगे? और धमाका हो गया लेकिन पटाखों की आवाज कहीं पर गूंजी नहीं। कुछ पता ही नहीं चला कि किसकी मान्यता लेकर और किस पर प्रयोग चला कर दवाई का दावा किया गया। अच्छा हुआ कि सरकार ने ऐन मौके पर हाथ झटक दिए; नहीं तो सब तरफ से जल्दबाजी का आरोप लगता। बाबाजी तो दावा किया तबसे दिख ही नहीं रहे हैं।

बाबा जी का योगदान

योगा पहले भी था लेकिन बाबा जी ने खुद को उदाहरण बनाकर उसे लोकप्रिय बनाया। उसी माध्यम से पतंजली आयुर्वेद का भी बडा संसार खड़ा किया। शुद्धता की गारंटी देकर  अन्य अनेक खाने पीने की चीजों का उत्पादन वे बड़ी मात्रा में कर रहे है। उसे खास ग्राहक पसंद करते है। उन्हीं की दम पर बाबा जी अपने प्रतिस्पर्धीयोको शीर्षासन करवाने का दम भी भरते हैं। कुछ सेवा प्रकल्प भी वे चला रहे हैं। उनका देश में ही नहीं दुनिया में बड़ा मान-सम्मान है। वे स्वदेशी के वाहक है। कठोर परिश्रम के बल पर योगा और उद्योग कां ऐसा मेल उन्होंने करवाया कि पैसा तो मिला ही, साथ में देश को नई पहचान दिलाने काम उन्होने किया है। शायद उसी से आत्मविश्वास बढा, जो आज ज्यादा ही बढ़ गया है। कोविड का बाजार हथियाने के चक्कर में थोड़ी जल्दी हो गई। जल्दी की तो कम से कम दवा को दुनिया में लाने से पहले उसकी प्रक्रिया और नियमों का पालन करते तो आज हर किसी की जुबां पर उन्हीं का नाम होता।

लेकिन बाबाजी को डरने की जरा भी जरूरत नहीं है। आखिर आयुर्वेदिक दवा ही तो है और चमत्कारी दावों की छूट आयुर्वेदिक के सिवा किसी को भी नहीं दी जा सकती। वैसे बाबाजी के पास एक अच्छी फैसिलिटी है। दवा से बीमारी दूर ना हो तो योगा करो और योगा से फायदा ना हो तो गोली लो, ऐसी सुविधा दूसरे पॅथी में नहीं है। अभी इसे भारत में ही लांच किया गया यह अच्छा हुआ।

योग के माध्यम से भारत के घर-घर में पहुंचने का कर्मयोग बाबाजी साध चुके है। भारत में योगा और आयुर्वेद परंपरा का हिस्सा रहा है। लेकिन उसके प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने का श्रेय नि:संशय रामदेव बाबा को जाता है। योग से साधक को समाधी का आनंद प्राप्त होता है। ज्यादातर संत एकांत और अपनी ही दुनिया में जीने के आदी होते हैं। लेकिन बाबाजी ने योगा के साथ आयुर्वेद का प्रसार प्रचार करते हुए, उसे एक व्यावसायिक प्रतिष्ठा दिलवाने का काम भी किया है। पतंजलि उद्योग समूह के रूप मे एक संत के पुरुषार्थ की नई मिसाल कायम की है। वे फकीर संत नहीं, एक साम्राज्य के धनी हैं।  बस दुनिया में तहलका मचाने का उनका ख्वाब अभी पूरा ना हो सका।

पीछे हटना नहीं

बाबा जी की दवा का असर दिखना अभी बाकी है। 3 दिन में कोरोना का पेशेंट ठीक हो जाएगा यह बाबाजी का दावा है। यह सच हो जाए तो आज बाबा जी जीते जी भगवान बन जाएंगे। कोरोना से मरने वालों का सिलसिला यहीं पर रुक जाएगा।भगवान करे कि उनकी दवा का लोगों पर जल्दी असर हो। डर के इस माहौल से बाहर निकल कर लोग चैन की खुली सांस ले सकें। सभी यहीं चाह रहे हैं। इसीलिए बाबा जी को जरा भी पीछे हटना नहीं चाहिए।

कोविड 19 से दुनिया की तुलना में भारत का थोडा कम नुकसान हुआ है; इसका कुछ श्रेय योगगुरू बाबा रामदेव जी को देना  पड़ेगा। पहले लोगो ने केवल किताबों में हीं योगा देखा-पढां था। गरिबी-अभाव था, लेकिन जो भी खाते उसमे सत्व था। लेकिन वैश्विकीकरण आया, पैसे कां चलन बढां, खान-पान, चाल-ढाल बदली, स्पर्धा आयी, आदमी की स्पिड तेज हो गई, इसलिए तनाव भी बढ़ा। इस के पीछे तरह के डिसीज आये। चारो ओर तरक्की दिखने लगी लेकिन आदमी अंदर से खोखला होता गया।

तरक्की तो दिख रहीं थी लेकिन उसके साथ आयी भिन्न मनो-शारीरिक बिमारियो से लोग त्रस्त थे। सब तरफ स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हुई है, रिसर्च में गहराई आयी है। अरबों का बजेट दुनिया स्वास्थ्य पर खर्चा करती है। लेकिन फिर भी आदमी पागल-बिमार हुवा जा रहां है। ऐसे में किसी गांव से आये बाबा ने लोगो का विश्वास जीतकर उनके बीच योगा की चाह पैदा करवाई। बाद में भूलाए गए आयुर्वेद को मेन स्ट्रीम मे लेकर आए। वहां से बाबाजी का ग्राफ चढ़ता ही गया। अभी बहुत सारे लोग भारत में कई सालों से योगा कर रहे हैं। श्वसन संस्था पर हमला करने वाले कोविड-19 को रोकने में योगा से बढ़ी हुई प्रतिकार शक्ती काम दे रही है। निश्चित ही इसका श्रेय स्वामी रामदेव को भी जाता है।
कुछ करेंगे
रुकना मत

बाबा का ही करिश्मा है कि बडी संख्या में लोग आयुर्वेद को अपना रहे हैं। कई बार आयुर्वेदिक के दावे और उसके प्रतिफल में मेल नहीं बैठता। करोना के इस दौर में आयुर्वेद कुछ कर पाता तो भारत का नाम दुनिया में रोशन हो जाता। चारों ओर से पैसा बरसता तो रोज पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाने की नौबत ना आती!

 अब हम दुआ ही कर सकते हैं कि चीन के साथ बॉर्डर पर गोली ना चले और कोरोना वायरस पर बाबाजी की गोली चल जाए। एक हालात मोदी जी की परीक्षा ले रहे हैं तो दूसरी ओर स्वामी रामदेव की दवा दांव पर लगी है। भारत के लोग बहुत झेल चुके हैं। अब जो भी हो अच्छा हो!






शुक्रवार, 19 जून 2020

चीन के गुलाम आत्मनिर्भर कैसे बनेंगे ?

सभ्य लोगों की दुनिया मे 
धोखेबाज ड्रैगन
डर कां माहौल है। कोविड 19 कहर ढां रहां है। पुलिस, सरकारी यंत्रणा, स्वास्थ्य यंत्रणा दबाव में है। दबाव होगा ही, क्योंकि इतना काम करने का वक्त कभी
आयेगा यह सोचा नहीं था। अव्यवस्था काफी है। पेशंटस् बढते जा रहें है। सुधर नहीं रहां है।

 इंतजार हो रहां है कि कोई तो इलाज खोज लेगा। युरोप-अमरिका के पास सारे संसाधन है, पैसा है, उच्च कोटि के वैज्ञानिक है, फिर भी वह थक गए। भारत भी कोशिश कर रहा है। लेकिन हमेशा की तरह तरह जुगाड़ू इलाज से बात नहीं बनने वाली नहीं है। इलाज पक्का चाहिए। मोदी जी भी समझते होंगे। इसलिए उन्होने भी
कोरोना का प्रतीक
अब कोरोना पर पब्लिकली बोलना छोड़ दिया है। उनके एक समर्थक स्वामी रामदेव कोरोना पर दवा ले आए, लेकिन दवा लॉन्च होते से ही विवाद हो गया। दुनिया को चौंकाने का तंत्र अभी काम नहीं करेगा। पता नही लोगो को अभी  कितनी लंबी प्रतीक्षा करनी है।

प्रकृती भी खफा है। हलके ही सही भूकंप के धक्के इशारा दे रहें है। बीच में ही टिड्डीया आयी और किसानो कि फसल को नुकसान हुआ। यह तो प्राकृतिक संकट रहां लेकिन आदमी ही नही देशो के भी दिमाग खराब होते जा रहे हैं। धोखेबाज चीन को युद्ध की दुर्बुद्धी हो रहीं है।
पाकिस्तान की मित्रता कां
शायद चीन पर असर हुवा है; अन्यथा यह पत्थरमार पेटर्न चीनी जवानों में कहां से आ गया?

अबतक एलएसी पर चीन और भारत के जवानों में धक्कमधक्की देखी-सुनी गई थी। अब शस्त्र संधी कां पालन तो हो रहा है लेकिन पत्थर, डंडे, चाकू, रॉड से हमला करके जवानों को मार दिया जाए, ऐसा युद्ध समझ के बाहर है। चीन धोखेबाज, बेइमान है।

विदेश नीति तो आम आदमी के दिमाग के परे है। वह तो सरकार और उसके लोग ही जाने। लोग अपनी क्षमता से सोचते है। चीन आज गलवान वैली मे घुसा है, तब हमे उसके सामान पर बहिष्कार की बात सूझ रहीं है। चीन अपना
काम की बात
यहां बैठा है
चालबाज चीन
सामान लेकर दशकों से हमारे घर में घुसकर कब्जा जमा चुका है। अब अचानक उसके सामान पर बहिष्कार की बांत जोर-शोर से उठने लगी है।

भारत चीन से निर्यात की तुलना मे चार गुना आयात कर रहां है। भारत के लोगों को चीनी माल की चटक लग चुकी है। लगभग जरूरत की हर चीज सस्ते मे चीन से हमारे घर में पहुंच रहीं है।
 जो लोग आज आंदोलन कर रहे हैं वह भी उनकी ही वस्तुओं का इस्तेमाल करते हैं। सरकार लोगो को क्यों कहती हैं? इंपोर्ट कम करे। लेकिन देश में जो अरबों का चीनी माल पड़ा हुआ है उसका घाटा क्या व्यापारी उठाने को तैयार है? उद्योगपतियों का इतना सारा पैसा चीन से व्यापार में फंसा हुआ है। क्या उन्हें सरकार समझा पाएगी? तो फिर लोग जिनपिंग की अंत्य यात्रा निकालकर क्या संदेश दे रहे हैं?

कोरोना कां सच छुपाने के कारण चीन की दुनिया मे छी-थू हो रही है। युरोप- अमेरिका चीन पर खफा है।आएदिन चीन को सबक सिखाने की बातें हो रही है। उस पर आर्थिक निर्बंध लगना शुरू हो गया है। ऐसे में इतना बड़ा ग्राहकों का बाजार यानी भारत आत्मनिर्भरता की बात करें यह चीन को बर्दाश्त नहीं हो रहा है। दस देशों की आबादी भारत में बसती है। भारत चीन की बनी बनाई दुकान है। उससे वह खोना नहीं चाहेगा। इसी लिए दबाव बनाए रखना चाहता है। इसलिए उसकी खुराफात चलती रहेगी। कोरोना के इस संकट काल का मुहूर्त खोज कर चीन होशियारी कर रहा है। लेकिन हमारे जवान बॉर्डर पर मुस्तैद है। सीमा की रक्षा का तो वह संभाल लेंगे लेकिन क्या भारतीय आम आदमी उसमें हाथ बटाएगा, यह असली सवाल है।

 चीन को आर्थिक धक्का देने के लिए केवल व्यापारी ही नहीं आम लोगों को भी कुछ त्याग करना पड़ेगा।
आत्मनिर्भरता के नाम पर जो स्वदेशी को बढ़ावा देने की बातें हो रही है उसमें कितना दम है? हमारे व्यापारी तीन सौ रुपये कां एलईडी बल्ब बेच रहे थे, तब चीन तीस रुपये का बल्ब लाया था। हम इससे कैसे निपटेंगे? क्या चीन से निकली हुई कंपनियां सच में भारत में आ रही है? या दूसरे देशों में जा रही है? चीन अब केवल सस्ते माल के लिए ही नहीं अपितु क्वालिटी प्रोडक्ट के लिए भी जाना जा रहा है। क्या हम उससे स्पर्धा करने वाली चीजें पैदा कर पाएंगे? कई सारे सवाल है। लेकिन मोदी जी ने सर्वदलीय बैठक में चीन को ठीक करने का वादा किया है; उस पर देशवासियों को विश्वास करना चाहिए।

कोरोना भी चीन कां ही बच्चा है, पहले उससे तो दुनिया निपट ले। पहले उसे भगाना है। बाद में चीनी वस्तुओं का देखा जाएगा। तब तक दबाव की यह राजनीति चलती रहेगी। दुनिया चीन को डराएगी और चीन हमको। 140 करोड़ भारतीयों का बाजार उसे खोना नहीं है। उससे हम कैसे निजात पाएंगे?
मेड इन चायना
डिपेंडेंट भारत इंडिपेंडेंट कैसे बनेगा इसका गवाह बनने का मौका हमें मिले तो उससे बड़ा सौभाग्य दूसरा नहीं हो सकता। गुलामी से मुक्ती होगी तभी तो आत्मनिर्भर बनेंगे!










सोमवार, 15 जून 2020

भारत को डिप्रेशन क्यो नहीं होता ?

माना कि कोरोना विषाणू ने दुनिया के हर आदमी पर असर डाला है; लेकिन भारत की बात हीं कुछ और है। हमने इसे
बिलकुल भी गंभीरता से नहीं लिया है।

लॉकडाउन में पुलिस के डंडे पड़े तब लोग घर में दुबके। कहां जा रहा है कि पहले से आज लॉक डाउन की ज्यादा जरूरत है। लेकिन पहले लॉकडाउन नहीं होता तो आज उसकी जरूरत ही नहीं होती, इतना कोरोना घर घर में बस गया होता।  भारत के हालात युरोप-अमरिका से भी बदतर होते।

 जल्दी लॉकडाउन हुआ तो ठीक ही हुआ। सहीं कहें तो मौत की यहां कोई कीमत ही नहीं है। गरीब भारत की जेबे खाली है। उन्हें जीने- मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता. पैसे
वालों को जरूर चिंता है। खास तौर पर उनकी जान अधर में लटकी है जिन्होंने फोर्बज् की लिस्ट में आने के लिए जीवनभर जाने कितने पापड़ बेले है।
कोरोना पिक पर है और कहीं पर चुनाव की सरगर्मियां तेज होने लगी है। कोई टेंशन नहीं है।
ऐसा पोज कभी मत देना
गलत पोज
यहां किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. लोग मर रहे हैं,  हॉस्पिटल में पेशंट्स के पड़ोस में लाशें पड़ी है; लेकिन कोई पैनिक नहीं है. लगभग सारे एमपी,  एमएलए, अनगीनत मिनिस्टर, हजारों पार्षद जान बचाकर अपने घरों में बैठे हैं। आम लोग मौका मिलते ही रास्ते पर आ जाते हैं। एकदम बढ़िया चल रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष घर पर है। लोग घर में हो या बाहर अपने बलबूते पर जिंदा है।

पांच-सात सौ तो वैसे भी रोज मरते है, ऐसा बेफिक्री वाला एटीट्यूड जहां पर है, वहां दुनिया की तुलना में मोर्टालिटी रेट कम होना लाजमी है।

और सहीं भी  है। रोड एक्सिडेंट में हीं सालाना डेढ लाख लोग दम तोड देते है। किसानो का मरना रोज की बात है। लॉकडाउन में प्रवासी मजदुरों को तो रोज मरते-कटते देखा होगा। मौत को यहां सिर्फ आंकड़ों में देखते हैं।

मौका मिलते ही रास्तों पर इतनी भीड़ दिखने लगती है। डर पुलिस का है, कोरोना का नहीं।

यहां है डिप्रेशन

अभी एक गुणी अभिनेता सुशांत सिंह के मृत्यू कां बडा हीं दुखद समाचार आया है। इस समय कोई गुजर जाए, तो कोरोना पर शक होता है। लेकिन  आत्महत्या बतां रहें
है। असली कारण कां बाद में पता चलेगा। तब तक डिप्रेशन पर माध्यमों ने चर्चाएँ होती रहेगी । सुशांत न्यू इंडिया के प्रतिनिधि थे। यह इंडिया समृद्ध है। उसके पास सारी सुविधाएं हैं। पैसा है, बंगला है, गाड़ी है। इज्जत है। शोहरत है। सारी ब्यूरोक्रेसी उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ी है। फिर भी डिप्रेशन है। सबकुछ पाकर किस चीज की निराशा है? क्यों अकेलापन है? इस अगडे इंडिया कां धीरज जवाब दे रहां है...  यही इंडिया पिछड़े भारत को मोटीवेशनल लेक्चर्स बेचता रहता है। उन्हीं की हिम्मत जवाब दे रही है। अजब न्याय है!

यहां नही है डिप्रेशन
नो डिप्रेशन
नो डिप्रेशन!

जरा उस भारत कि तरफ देखो भाई! कोरोना के इस संकट काल में इनके संसार रास्ते पर आ गए हैं। इनके रोजगार गए हैं। यहां लाचारी है लेकिन जीने की जिद नहीं छुटी है। वो लॉकडाउन के बाद शहर में परिवारसमेत फँस गया। उसने परिवार को सैकड़ों किलोमीटर ढोया। ऐसा पैदल प्रवास शायद ही इतिहास में कभी हुआ है। पैर फटे लेकिन हिम्मत नहीं टूटी। लाखों मजदूरों का भविष्य खतरे में है लेकिन कहीं पर भी डिप्रेशन नहीं है। उसकी सहनशीलता, उसके उम्मीद का दायरा बड़ा है। उसकी क्षमाशीलता लाजवाब है! सलाम है उस मजदूर को!
घर वापसी को निकले मजदूर
घरवापसी





सोमवार, 23 सितंबर 2019

मोदी जी विश्व गुरू बन चुके हैं...

अमेरिका के ह्युस्टन में मोदी जी ने समर्थकों को ऐसे झुककर अभिवादन किया.
आखिरकार भारत के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अमेरिका में अपना विश्वरूप दर्शन दिखा हीं दिया. उनका यह रूप देखकर 50 हजार से ज्यादा संख्या में वहां बैठे अमरिकी भारतीय भावविभोर हो गए. कईयों के आंखों से आंसू छलक आए. पूरी दुनिया के लोगों ने बगैर पलक झपकाए यह नजारा देखा. भारतीय लोगों के खुशी का तो ठिकाना नहीं था. बड़ा ही अद्भुत नजारा था.

 सच में मोदी जी खिलाडीयों के खिलाडी है. अभी अमेरिकी चुनाव होने को वक्त है, लेकिन विजय की रैली कैसी होती है उसकी झलक उन्होंने ट्रंप को अभी से हीं दिखा दी है. कोई बड़ा मैच जीतने के बाद जिस तरह से सारे खिलाड़ी ट्रॉफी लेकर स्टेडियम का चक्कर लगाते हैं, वैसे ही मोदी जी ने ट्रंप का हाथ कस कर पकड़ के चक्कर लगाया. मानो सारे विश्व पर विजयी परचम लहरा दिया हो. यह दृश्य देखकर सारी दुनिया ने दांतो तले उंगलियां दबा ली होगी. ऐसा लग नहीं रहा था कि अमरिका कां प्रेसिडेंट दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी है. वह मोदी जी के पीछे घसीटे जा रहां था. मोदी जी की जय हो! विश्व गुरु जिंदाबाद!

विश्वगुरु मोदी जी संबोधित करते हुए.
  एक तरफ अमेरिका में मोदी जी के जयकारे लग रहे थे और दूसरी तरफ मोदी जी के फेल होने का इंतजार करते-करते थके हुए कांग्रेसी हाथ पर हाथ मल रहे थे. लेकिन उन्हें पता नहीं है कि हाथ पर हाथ मलने से और मुठ्ठिया पटकने से किसी का सत्यानाश नहीं होता. या तो संघर्ष करो या फिर दुश्मन से सीखो, यही रास्ता है. कांग्रेसी दोनों काम नहीं कर रहे हैं. सच में कांग्रेसियों को मोदी जी से कुछ सीखना चाहिए. भारत में कोई दो पैसे नहीं लगा रहा है. न्याय, पुलिस व्यवस्था खत्म हो चुकी है. गुंडे हीं अब न्याय कर रहे हैं. यही समझिए कि गुंडों की समांतर न्याय व्यवस्था चल रही है. न्याय के लिए लोग पुलिस की बजाय गुंडों पर विश्वास कर रहे हैं. सरकारी बाबुओं का भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है. इसी से समझ लीजिए कि नोटबंदी के दौरान घोटालों में पकड़े गए बैंक कर्मचारियों पर क्या कार्रवाई हुई इसका कोई आंकड़ा आज तक सामने नहीं आया है. लेकिन मोदी जी की तरह सारे नेता कहते हैं- ना खाऊंगा ना खाने दूंगा! भ्रष्टाचार के बजाय जो विरोध में बात करेगा उसके प्रति जीरो टॉलरेंस दिख रहा है.

आरक्षण तो ऐसा विकराल रूप धारण कर चुका है कि न्यायाधीशों के दिमाग भी चकराने लगे हैं. सुप्रीम कोर्ट के जज भी रस्ते पर आकर न्याय की भीख मांग रहे हैं. अर्थव्यवस्था खड्डे में जा रही है; लेकिन हमारा देश विश्व गुरु बन गया है.चमत्कार है! पहली बार ऐसा हुआ है कि केवल नेता के भाषणों पर कोई देश ऊंचाइयों को छू रहां है.
मोदी जी ने ऐसे हाथ दिखाया तो तालियां गूंज उठी
वैसे भी यह आभासी युग है. भारत में तो सारा युवा वर्ग नेट से चिपका रहता हैं. यह तो अच्छी बात होनी चाहिए. लेकिन असलियत यह है कि इनका समय नॉलेज बटोरने की बजाए टाइमपास में गुजर रहा है. व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर पर यह युवक ज्यादातर भड़काऊ बातें या लैंगिक विषयों पर लिखते रहते हैं. ना उन्हें रोजगार का खयाल है ना अपने भविष्य की चिंता. बस आभासी दुनिया में जी रहें हैं.

ऊपर से कल 'हाउडी मोदी'के उपलक्ष में हमारे प्रधानमंत्री जी ने कह भी दिया कि भारत में सब ठीक चल रहा है. सबके मुंह बंद है. कांग्रेस मरी पड़ी है. बचा विपक्ष गालियां खा रहा है. पत्रकार लोगों की समस्याओं पर मौन साधे हुए हैं और सत्ता का गौरव गान कर रहे है. मतलब भारत में सब ठीक चल रहा है.

भारत मंदी के परिणामों को झेल रहां है. लोगों की क्रय शक्ति खत्म हो गई है. दूसरी तरफ प्रधानमंत्री जी के शब्दों में विकास की गंगा बह रही है. विश्व में किसी देश के साथ ऐसा पहली बार हो रहा है.
मोदी जी और ट्रंप ने साथ चलकर दोस्ती का परिचय दिया.
भारत में बैठा विपक्ष पिछले कुछ दिनों से मोदी जी के विश्व गुरु बनने के ख्वाब में अपशगुन कर रहां था. उनके छवि का मजाक बना रहां था.
 कांग्रेसी कहते हैं कि मोदी जी प्रधानमंत्री नहीं प्रचार मंत्री है. चौबीसों घंटे और बारह महीने चुनावी मोड में रहते हैं. सो तो सही है. मोदी जी तो पहले प्रचारक हीं थे. लेकिन कैनवस छोटा था. बस हिंदुत्व का प्रचार करते थे. लेकिन अब कैनवासिंग के लिए उन्हें दूसरे देशों से भी निमंत्रण आ रहे हैं. भाई तुम्हारी क्यों जल रही है? तुम क्यों ढंग का प्रचार नहीं करते? जिन्होंने पार्टी को डुबाया उनको भी तुम अभी तक बाजू हटा नहीं पाए.उलटे जेलों में जाकर उनके गले पड रहे हो. उसमें भी मोदी जी हीं मदद कर रहे हैं. कांग्रेस के एक एक नेता को जेल भेज रहे हैं. अब और क्या चाहिए? यह सफाई तो कांग्रेसियों को ही करनी थी. इतना ही नहीं भ्रष्टाचार में डूबे बचे-खुचे कांग्रेसियों को भी बीजेपी अपनी और खींचकर पवित्र-शुद्ध कर दे रहीं हैं. इस पॉलीटिकल स्वच्छ भारत अभियान का फायदा कांग्रेस को भी हो रहा है. अब कांग्रेस को क्या चाहिए? संघर्ष तो उन्हें नहीं करना है. राहुल-प्रियंका है तो संघर्ष एकदम फालतू बात है.
मोदी जी ने एक तीर में कई शिकार कर दिए है. भारत के चुनावो में लगातार प्रचार करके वे बोर हो गए होंगे. क्योंकि उनके सिवाय बीजेपी के एक आदमी का भी चुन कर आना मुश्किल है. चाहे वह लोकसभा के चुनाव हो या ग्राम पंचायत के, सब तरफ मोदी जी की डिमांड है. मोदी जी ने सही कहा, भारत में सब ठीक चल रहा हैं. लोगों के प्रॉब्लम खत्म हो गए हैं. क्योंकि छोटे से छोटा चुनाव भी लोकल प्रश्नों के बजाय मोदी जी की इमेज पर लड़ा जा रहा है. भारत देश कांग्रेस मुक्त होते होते समस्या मुक्त हो गया है. मोदी- मोदी के नारों ने सबके दिमाग को झकझोर के रख दिया है. कल का नजारा तो ऐसा था कि दुनिया में जहां भी भारतीय लोग बसे हैं वहां मोदी जी को प्रचार के लिए बुलाया जा सकता है. यह मोदी जी के सबसे पसंद का काम है. सारा विश्व मोदी जी को सैल्यूट ठोक रहा है. बड़े-बड़े लोग उनकी सभाओं में शिरकत करते हैं. बस विश्वास की कहां कमी है वह समझ में नहीं आ रहा है. भीड़ तो बहुत इकट्ठी हो रही है. लेकिन पैसा इकट्ठा नहीं हो रहा है. यह कैसी इमेज है हमारी, कि सारे विश्व में हमारा डंका बज रहा है लेकिन विश्वास कोई नहीं कर रहा है. हमारे माल को दुनिया के मार्केट में कोई कीमत नहीं है.भारत में कोई पैसा हीं नहीं लगा रहा है और जो पैसा कमा रहां है वह विदेशों में जाकर बसना चाह रहां है. बस इतनी ही दिक्कत है. बाकी विश्व गुरु तो हम बन हीं चुके हैं.
मोदी समर्थकों के खिले हुए चेहरे देखिए...


गुरुवार, 12 सितंबर 2019

सफेद हाथी बनकर रह गया 'ट्राई' !


तू है तो जीवन है
टीवी के बगैर जिंदगी मुश्किल है. रोटी, कपड़ा और मकान कां नंबर बाद में आता है. लगता है इनके बगैर हम जी लेंगे; लेकिन टीवी नहीं होगा तो हमारी सभ्यता कुपोषित होकर विलुप्त हो जायेगी!

मोदी सरकार के मूँह से निकला हर विचार, सोच एक संक्रामक बीमारी की तरह सबको जल्द हीं घेर लेता है. चाहे वह आम आदमी हो या ब्यूरोक्रेसी; सब उसके चपेट में आ जाता है. ब्यूरोक्रेसी सरकार के आदेशों को इंप्लीमेंट करती है. तो उसके कामकाज पर सरकार का असर दिखना बिल्कुल लाजमी है.

ऐसे ही सरकार से जुड़ी एक संस्था है 'ट्राई' याने टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण). इस ट्राई ने सबको परेशान करके रख दिया है. यह संस्था ग्राहकों पर ऐसे ऐसे प्रयोग कर रही है कि उसके कामकाज का तरीका अब आकलन के परे होता जा रहां है.
इस देश के आधे से ज्यादा टीवी दर्शक अर्ध शिक्षित और अशिक्षित है. यह जानते हुए भी ट्राई के सर्कुलर अंग्रेजी में निकलते रहते हैं. यह लोग इतने भी प्रोफेशनल नहीं है कि ग्राहकों को आसान भाषा में समझा सके.यह FTA मतलब फ्री टू एयर क्या है? इसके तो 154 रु.मंथली टैक्स समेत हर ग्राहक कों लग रहां हैं. फिर यह FTA कैसे हुआ? जिसके भरोसे कमाना है उसे तो यह बातें समझ में आनी चाहिए? जरूरी नहीं है कि इस फिल्ड के टेक्निकल टर्मस् और नये-नये शब्दों कों ग्राहक समझ सके. ग्राहकों में कन्फ्यूजन बने रहने का यह भी एक बड़ा कारण है. यह एक बिझनेस होकर भी ट्राई का व्यवहार बिलकुल 'सरकारी' है; जहां ग्राहकों कि कोई कीमत नहीं है.
ट्राई के मुखियां
 इतने में तो रोजाना सर्कुलर निकल रहे हैं. ट्राई नई नई योजनाएं लाकर ग्राहकों के प्रति चिंता का दिखावा कर रही है; पर वह योजनाएं ग्राहकों के समझ में आए तब ना?

पिछले दिनों में ट्राई ने ऐसे ऑर्डर छोड़े हैं कि उससे सामान्य ग्राहक और नेटवर्क प्रोवाइडर भी परेशान हो गए हैं. एक सिस्टम सेट होता नहीं कि ट्राई का नया सर्कुलर आ जाता है. इसमें नेटवर्क कंपनियों का कोई नुकसान नहीं होता. उन्हें अपने बिजनेस से मतलब है. पहले ही कंपनियों के सैकड़ों पैकेजेस उपलब्ध है. उसे ही लोग समझ नहीं पा रहे हैं और रोजाना नये पैकेजेस आते रहते हैं. ट्राई और नेटवर्क प्रोवाइडर्स ने लोगों को पागल करके रख दिया है. नुकसान सिर्फ आम ग्राहकों कां होता है. नेटवर्क कंपनियां सारा कन्फ्यूजन आम ग्राहकों पर डाल देती है और ग्राहक हमेशा लूटता रहता है.

कुछ साल पहले सेट टॉप बॉक्स कंपलसरी कर दिया गया. तब बॉक्स बनाने वाली कंपनियां और केबल चालकों की चांदी हो गई. आजकल कई घरों में अमूमन दो से लेकर पाँच तक टीवी होते हैं. उतने सेट टॉप बॉक्स लोगों को लगाने पड़े. लेकिन उनकी कीमत पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं था. शुरुआत में तो प्रति सेट टॉप बॉक्स 4 हजार रुपए वसूले गए. अगर कोई ग्राहक सर्विस प्रोवाइडर बदल दे तो सेट टॉप बॉक्स और पैसा भी गया काम से. अभी भी ट्राई ने इस समस्या पर कोई रास्ता नहीं निकाला है.

वह कम ही था कि इस साल फरवरी में ट्राई ने नया सिस्टम लागू कर दिया. सरकार का इनकम बढे और केबल ऑपरेटर्स को लगाम लगे इस के लिए यह कवायद की गई. लेकिन यह सिस्टम कैसे चलेगा, इस पर कोई स्पष्टता नहीं थी. बस ट्राई ने सर्विस प्रोवाइडर पर थोप दिया और उन्होंने आम ग्राहकों को ठोक दिया.
त्रस्त लोग बस चिल्लाते रहते है...
कंपनियों के पास ग्राहकों को समझाने का वक्त नहीं था. उन्होंने हडबड में पैकेजेस बनाएं. ग्राहकों को कुछ समझ में नहीं आया. कई दिनों तक सर्विस प्रोवाइडर के ऑफिस में चक्कर काटकर लोग थक गए. बुजुर्ग लोग और महिलाओं के भी हाल हुये. टीवी बंद होने का डर दिखाया जा रहा था.

बताया जाता कि घर को जा कर अपने पसंद के चैनल्स की लिस्ट बना कर लाओ. लोगों ने रात रात आंखें फोड़ कर लिस्ट बनाई तो फिर उसे स्वीकारने से कंपनियों ने मना कर दिया. क्योंकि हर एक ग्राहक के पसंद के अनुसार लिस्ट बनाना कंपनियों के लिए संभव नहीं था. तो फिर उन्होंने उनके हिसाब से पैकेजेस बनाकर ग्राहकों के सामने रख दिए. उसमें से चुनाव करने के सिवाय लोगों के सामने पर्याय नहीं था. इस कवायद में बिल कम करने का ट्राई का वादा पूरा न हो सका. उलटे चैनल तो कम हो गए और बिल दुगने हो गए. इस चीटिंग की वजह से कई ग्राहकों ने अपने टीवी भी बंद कर दिए है.
तेरे बिन सुनी सुनी है राहें...
कुछ कंपनियां लोगों को नेट पर जाकर पैकेजेस चुनने की सलाह दे रहे थी. ग्रामीण इलाके में अभी भी जवान लड़के छोड़कर बाकी लोग इंटरनेट से उतने परिचित नहीं है. इससे जो कन्फ्यूजन फैला वह आज तक कायम है. उसका फायदा उठा कर कंपनियों ने सबको दुगने बिल के मैसेजेस भेजना शुरू कर दिया.

नया सिस्टम आते ही केबल चालक और ट्राई के बीच में झगड़े शुरू हो गए. यह मामला कोर्ट तक भी गया. आम आदमी के समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था.लेकिन ट्राई कि फेकम् फाक बातोंपर विश्वास रखकर लोक सहते रहें. बिल कम होने का इंतजार करते रहे. यह सब हो रहा था तभी लोकसभा चुनाव आ गए. लोग परेशान थे लेकिन राष्ट्रवाद कि ऐसी आंधी चली कि देशवासियों की असली समस्याएं उस सैलाब में बह गई.

बिल बढ़ गए और चैनल कम हो गए. टीवी ग्राहक रो ही रहे थे कि ट्राई के चेअरमन शर्मा जी ने स्टेटमेंट दे दिया कि 20 परसेंट ग्राहक को के बिल कम हो गए. यह जानकारी उन्होंने किस आधार पर दी थी इसका अभी तक पता नहीं चल पाया है. लोग परेशान होते रहे...

दरमियान सैकडो जागरूक लोगों ने ग्राहकों की समस्याओं से ट्राई को अवगत कराया. ट्राई का टेंशन बढ़ गया तो इतने में उन्होंने फिर एक सर्कुलर निकाला कि नेटवर्क सर्विस प्रोवाइडर्स के पैकेजेस कि समीक्षा होगी. लोगों के बिल कम करने पर विचार होगा. ऐसे ट्राई ने कहां ही था कि कंपनियां सतर्क हो गई. शायद उनके दबाव का ही परिणाम था कि दूसरे पल ही ट्राई अपने वादे से मुकर गई. बताया गया कि कोई बड़ा फेरबदल नहीं होगा अब फिर से ग्राहक सर पर हाथ देकर बैठे हैं.अच्छे दिन के इंतजार में...
ट्राई के ऐसे आर्डर आए दिन निकलते रहते हैं.
यह सरकार कुछ काम करती है और बहुत कुछ फेंकते रहती हैं. ट्राई के अधिकारियों पर सरकार के स्टाइल का कुछ ज्यादा हीं असर दिख रहा है. इस स्वतंत्र सरकारी संस्था का कोई ताल दिख नहीं रहां है. बेचारे भारतवासी केबल वालों की कृपा से जैसे तैसे 200-300 रु.में सारे चैनल देख रहे थे. तकलीफ केबल चालक भी दे रहे थे, लेकिन लोग निभा रहे थे. क्योंकि इतने पैसे में दुनिया भर के चैनल का आनंद मिल रहा था. ट्राई को लोगों की यह खुशी देखे नहीं गई. तरीका वही फेकम् फांक वाला था. नये पैकेज के अनुसार ग्राहकों का कैसा फायदा होगा, सस्ते में चैनल देखने को मिलेंगे, लोगों के पैसों की बचत होगी, जो देखोगे उसी का पैसा देना पड़ेगा, सबके बिल कम होंगे वगैरा-वगैरा बातें करके नई योजना लोगों के माथे पर मार दी गयी. अपना फायदा देख कर लोग भी राजी हुए. जनमानस काफी उत्साहित था लेकिन अब 7 महीने हो चुके हैं और लोग सर पीट रहे हैं. क्योंकि उनके बिल कम होने के बजाय काफी बढ़ गए हैं.

ऊपर से ट्राई के अधिकारी अलग-अलग स्टेटमेंट देकर लोगों को गुमराह करने का काम करते रहते हैं. शुरुआत में ही इस योजना की पोल खुल गई. रेवेन्यू बढ़ाने के लिए सरकार ने यह सब किया लेकिन पूर्व तैयारी ढंग से नहीं हुयी. जैसे नोटबंदी,जीएसटी लाते वक्त भी हुआ था.

जैसे ही लोगों की परेशानी बढ़ती है और वह कंप्लेंट करने लगते हैं उस वक्त ट्राई के अध्यक्ष बाहर आकर कोई नया शगुफा छोड़ देते हैं.और लोग अच्छे दिन आने के आस में लग जाते हैं.

लोगों कां किसी के कमाने को विरोध नहीं है; चाहे वह सरकार हो या उद्योजक. बस सिस्टमैटिकली कमाइए. करोड़ों ग्राहकों को बेवकूफ बनाकर नहीं, इतनी हीं अपेक्षा है. आखरी बात-लोगों को टीवी देखना है और उसके लिए वह खर्चा भी करने को तैयार है. लोग ढंग का रेगुलेशन चाहते हैं. यह जिम्मेदारी ट्राई को सौंपी गई है. उसे वह अच्छे से निभाए. रेगुलेटर कन्फ्यूजन बढ़ाने के लिए नहीं होता. ट्राई के लोग एक बार बैठ कर क्या करना है यह तय कर ले. बार-बार लोगों को परेशान ना करें. काम का दिखावा ना करें. ग्राहकों की समस्याओं को जल्द सुलझाएँ. दिखावे का सफेद हाथी ना बने. सात महीने बीत चुके हैं. कुछ तो करो साईं? सॉरी ट्राई...
अच्छे दिन की आस में मूंह मिठाई किजिए!




शनिवार, 17 अगस्त 2019

रस्ते पर हैं आबादी, क्या करेंगे मोदीजी ?

पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने जनसंख्या नियंत्रण कि बात की है;  वह भी लाल किले से स्वतंत्रता दिवस के मूहुर्त पर.  कश्मीर से कलम 370 हटाने बाद मोदी जी कि चौतरफा तारीफ हो रहीं है. यहां तक कि सर्जिकल स्ट्राईक का भी इतना स्वागत नहीं हुआ जितना इसका हो रहां है. लगता है लोगो के मन कि बात पुरी हो गयी है.
जनसंख्या का विस्फोट
यह ताकत किस काम की?
मोदी जी उनके पहले के निर्णयो में आयी असफलताओं के बाद अब पुरी फिल्डींग लगाकर काम को अंजाम दे रहें है. 70 साल पुरानी बिमारी का इलाज 370 को कलम करके हो गया है, यह धारणा ज्यादातर लोगो के मन में घर करके बैठ गयी है. भारतीय समाज खास करके हिन्दू काफी आंदोलित है. विरोध का स्वर काफी क्षीण है.
 इस सरकार ने पहले से हीं अपेक्षाएँ बढाकर रख दी है, तो लोगों के मन के घोड़े काफी तेजी से दौड़ने लगे हैं. अभी राम मंदिर कि बात हो हीं रहीं थी कि जनसंख्या नियंत्रण का विषय मोदी जी ने छेड़ दिया है.

इस विषय पर पहले से कई सामाजिक संस्थाये, बुद्धिजीवी समाज को जगाने का काम करते आ रहें है. लेकिन उनकी कोशिशों को अनेक मर्यादाएँ आती है. जनसंख्या नियंत्रण पर काम करने वाले एनजीओ को पैसा मिलता है लेकिन लोगों कां रिस्पॉन्स नहीं मिलता. बीच में एक संस्था कां नंबर व्हाट्स अप पर आया था कि आबादी पर लोग मशवरा दे. लेकिन इतना बडा विषय होकर भी लोगों कों उसमे इंटरेस्ट ही नहीं है. चार लोगो ने कुछ उपाय बताये होंगे. उससे बात आगे नहीं बढ़ती. जब कि इस एक विषय पर ध्यान दिया जाये तो देश कि किस्मत पलट सकती है. लेकिन यह आँसान काम नहीं है. इसकी तुलना में नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राईक जैसे निर्णय भी छोटे लगते है.

सरकारें कोई भी निर्णय ले एक वर्ग खुश होता है तो दुसरा नाराज. जनसंख्या नियंत्रण पर प्रत्यक्ष काम करना बडा मुश्किल है; क्योंकि सारा समाज नाराज हो सकता है. खास तौर पर गरीब. यहां अधिक बच्चे पैदा करना अधिकार और मर्दानगी से जोडा जाता है. सरकार ने कोई सख्ती दिखाई तो लोग बौखला जायेंगे. सरकार से नाराज हो जायेंगे. इसलिए बातें सभी सरकारें करती है, लेकिन कदम उठाने कि हिम्मत कोई दिखा नहीं पाता.
मोदी जी
मोदी जी ने कम-से-कम बात तो की है? मोदी जी काम तो करते है, साथ में कुछ फेकते भी रहते है. लोगों का मन टटोलने कां यह उनका तरीका है. अब देखिए जनसंख्या नियंत्रण पर मोदी जी बोले नहीं कि ओवेसी खडे हो गये. तीर सहीं लगा है.
कांग्रेस अभी कश्मीर पर बिझी है नहीं तो वे जरूर कुदते. अब हिंदू-मुस्लिम पर डीबेट चलता रहेगा, जो बीजेपी के लिए सबसे फायदे की बात है.
जनसंख्या नियंत्रण पर लोगो कां अनुभव अच्छा नहीं है. पिछली बार कांग्रेस के जमाने में लोगो कों पकड़ पकड़ के नसबंदी कराई गयी. कुछ लोगों ने चंद पैसे के लालच में नसबंदी करवाई थी. कुछ लोग पछताएँ और फिर विरोध हुआ तो सरकार ने कदम पीछे ले लिया.
लोग दरिद्रता में जीने को तैयार है लेकिन आबादी बढाने पर समझौता नहीं कर सकते. उसका सारा बोझ अंतिमत: सरकार पर याने कि करदाताओं पर टॅक्स बनकर पड़ता है. इस बढ़ती आबादी के कारण ही बेरोजगारी का प्रश्न विकराल रूप धारण कर चुका है. देश कि तिजोरी मे कितना भी धन आये, सारा लोगों कि प्राथमिक जरुरतों पर खर्चा हो जाता है. बचा सरकारी नोकर घर ले जाते है.

बाकी योजनाओ के लिए पैसा कम पड़ता है तो क्वालिटी से समझौता करना पड़ता है. वैज्ञानिक खोज पर पैसे के अभाव में 'जुगाड' कां असर दिखता है. फिर मोदी जी कों नाले के गॅस पर पकौड़े तलनेवाले को भी 'वाह' कहना पड़ता है. उपर से मोदी जी के ही लोग हिंदूओं को चार बच्चे पैदा करने कि सलाह देते है, तो लोग कन्फ्यूज हो जाते है.  प्रधानमंत्री कि सुने या धार्मिक नेताओं की सुनकर घरकी सदस्य संख्या बढ़ाए यह सवाल खड़ा हो जाता है. अच्छा हुआ कि बीजेपी की मातृसंस्था ने भी बढ़ती जनसंख्या पर चिंता जताई है. लेकिन उन्हीं से जुड़ी विश्व हिंदू परिषद हिंदुओं को चार बच्चे पैदा करने की सलाह देती आई है.एक ही बैठक में बैठने वाले लोग इस तरह से अलग अलग सलाह दे तो घोड़ा वहीं रुक जाता है. उससे इस विषय की गंभीरता खत्म हो जाती है.

मोदी जी कहते हैं भारत की युवा शक्ति राष्ट्र की संपत्ति है. यह शक्ति किस काम की? युवाओं का किस ढंग से उपयोग हो रहां है, उसे हम देख रहे हैं.एनआरसी, कॅब के मसले पर हजारों लोग रास्ते पर बैठ गए हैं. देश कां कामकाज ठप पड़ गया है. उसके पहले इन्हीं में से कुछ युवाओं ने तेज पर आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया. उसमे हजारों करोड़ के राष्ट्रीय संपत्ति कां नुकसान हुआ. ऐसी विध्वंसक आबादी किस काम की?
भारत की झोपड़पट्टीयां
आधा भारत झोपडपट्टीयो में बसा है.
लोग आबादी को ज्यादा गंभीरता से लेंगे ऐसा लगता नहीं. ऐसे विषय उनके दिल को छुते ही नही. लोगों को क्या चाहिए? रोजाना सनसनी! यहां अखबारों मे क्राईम पहले पन्ने पर होता है. जबतक रेप कि चार सवर्णन खबरे पढ नहीं लेते हमारा दिन अच्छे से नहीं कटता. इस देश कि दरिद्रता का बढ़ती आबादी यह एक प्रमुख कारण है. लेकिन ऐसे विषय को ना अखबार ना टीवी चैनल पूँछते है.

भारत में एवरग्रीन मुद्दा एक ही है. भारतवासी चाहे भूखे रह लेंगे, लेकिन हिंदू- मुस्लिम डीबेट नही देखे ऐसा हो नहीं सकता. वहीं भारत का राष्ट्रीय खाद्य है. इसीलिए किसी भी चुनाव में असली शराब के साथ 'हिन्दू-मुस्लिम' घुट्टी भी लोगो को पिलाई जाती है. उस नशे में वोटिंग होता है. पहले से हीं मन से बटे हुये हिन्दू-मुस्लिम और बट जाते है. कोई नई बात नहीं है. यह एक खेल है; जिसका कोई फायनल नहीं है.
 जब मोदी जी ने जनसंख्या नियंत्रण पर बात की उसके कुछ मिनट बाद ही ओवेसी ने विरोध का सूर लगा दिया. जैसे केवल मुस्लिमो कि आबादी रोखने कि बात मोदी जी ने कर दी हो. चलो, हिंदू- मुस्लिम वाला रंग तो लग गया. अब टीवी पर डीबेट चलेगा.
यह सरकार दो तरह से काम करती है. एक करने के काम और दुसरे कहने के काम. जनसंख्या नियंत्रण दुसरे कॅटेगिरी का कहने का काम है.
हर शहर कां यहीं हाल है.
जनसंख्या नियंत्रण महाकठीण काम तो है, लेकिन नाक में पानी आ रहां होगा तभी तो स्वतंत्रता दिवस पर मोदी जी को बात उठानी पड़ी है. जनसंख्या विस्फोट भविष्य कां नहीं आज का संकट है.डेढ सौ करोड़ के करीब हम आ चुके है.अभी तो लोग एक-दुसरे को सिर्फ लूट रहें है.बढती आबादी के कारण हीं सरकारें और समाज का सिस्टम दम तोड रहां है. आगे क्या होगा यह बात शिक्षित वर्ग अच्छे से सोच-समझ सकता है.