बुधवार, 8 जुलाई 2020

कोरोना वायरस की त्योहारों पर छाया ! तूम छुपे हो कहां...

चेहरा क्या देखते हो
चेहरा क्या देखते हो...
कोरोना वायरस ने लोगों की जीवनशैली को पलट कर रख दिया है। अभी अनलॉक का दौर चल रहां है। कामकाज रफ्तार पकड़ रहां हैं, लेकिन अनिश्चितता है कि कही फिर से लॉकडाऊन लौट ना आए। गती पकड़ते जीवन में वह जान नहीं है। अपनी ही धुन में तेज रफ्तार दौड़ती हुई दुनिया अब जैसे थम सी गई है। व्यवहार के तौर तरीके बदल गये है।
 अपनी शक्ल पर इतराने वाले आदमी का चेहरा ढक गया है। शक्ल को तरोताजा रखने के लिए लोग जाने कितना खर्चा करते हैं? आदमी, औरतें, युवा लड़के- लड़कियों और बच्चों तक को तरह की चेहरा चमकाने वाली फेस क्रीम की आदत पड़ चुकी है। लेकिन अब उसका यूज नहीं हो रहां है। शक्ल ही ढक रही है तो कौन क्रिम लगाए? फिल्म इंडस्ट्री, मॉडलिंग जैसे फील्ड का तो सारा धंदा ही चौपट हो गया है। ना कुछ फेअर दिख रहा है, ना कुछ लवली!

 हमारे कुछ लोकप्रिय नेता भी महंगे मेकअप करवाते है। लेकिन एक वायरस ने सबको चेहरा छुपाने पर मजबूर कर दिया है। स्वास्थ्य कर्मियों के तो सबसे बुरे हाल है। हमारा आधा चेहरा ढकता है तो दम रुकता है। उनका सारा शरीर घंटो ढका रहता है और कैसे हो पूछने वाला भी कोई नहीं। पिछले कुछ दिनों से इस सेवा से जुड़े हुए डाक्टर भूल चुके होंगे कि कब नार्मल पेहराव किया था। सबके शरीर ढके रहते है। चलो ठीक हुआ कि वायरस के खौफ से फिकी पड़ी चेहरे की रंगत छिप गयी। टमाटर जैसे गालों पर रुमाल ढक गया है। ढके चेहरे से अब केवल आंखें बोलती है। आंखों से जीने की चाह और दर्द भी झलकता है।

तूम छुपे हो कहां...

कोरोना के कारण सार्वजनिक तौर पर मनाए जाने वाले उत्सव बंद हो गए हैं। महाराष्ट्र में कई संस्था संगठनों ने इस
गॉड
साल गणेशोत्सव नहीं मनाने का निर्णय ले लिया है। दुर्गा उत्सव का भी शायद वही होगा। दिख रहा है कि इस वर्ष डांडिया से भी वंचित रहना पड़ेगा। डांडिया होगा भी तो मजा नही आएगा। युवाओं को बडा प्राब्लेम होगा। जिसका चेहरा देखना है उसे कैसे देख पाएंगे?

 महाराष्ट्र में आषाढी एकादशी के पर्व पर लाखो लोग उनके दैवत विठोबा के दर्शन हेतू पंढरपूर जाते है। गाव गांव से 'वारकरी' नाचते गाते 'दिंडी' के साथ विठोबा के दर्शन के लिए महिनाभर पहले ही पंढरपूर कूच करते है। रास्ते में
विठ्ठल
विठ्ठल
'गावकरी' भक्तो की सारी व्यवस्था का जिम्मा लेते है- स्वयंस्फूर्ती से। लाखो लोगो के इस मेले का कोई इव्हेंट मॅनेजमेंट नहीं होता। ना ही पुलिस को ज्यादा दखल देनी पड़ती है। यह अपनी तरह का बडा सात्विक उत्सव है।  अपने आप डिसिप्लीन चलता है। भक्तीभाव का यह पर्व पहली बार हो न सका।

वारकरी बडे दुखी है। वैसे इस उत्सव के पीछे की पौराणिक कथा सबको पता है। आषाढी एकादशी को भगवान सो जाते है। अब भगवान कार्तिकी एकादशी को उठेंगे। फिर वहीं उत्सव होता है। लेकिन शायद उस उत्सव का भी भरोसा नहीं है। अभी तो शुरुआत हुई है। आगे त्योहारों की लड़ी लगने वाली है। एक दुसरे घर खाने-पीने, प्रसाद का मौका चूक जाएगा। पता नहीं त्योहार कैसे मनाएंगे? देशभर घर के चौखट के बाहर अनेक उत्सव मनाए जाते है। कोरोना भी जोरो पर है। रोज के 25 हजार। उसका दायरा फैलता ही जा रहा है। कब रुकेगा यह सब?  क्या भगवान सच में सो गये है?

 भक्तो के उत्साह पर कोरोना की काली छाया पड़ गयी है। कोरोना लोगो की जान और त्योहार भी खाए जा रहां है। इसीलिए लोग में निराशा की
बाप्पा
भावना है। कहां गया भगवान? ऐसे सवाल गुस्से में पूछे जा रहे है। कुछ लोग उसके अस्तित्व पर ही शंका उपस्थित कर रहें है। संकट में दिमाग चलना बंद हो जाता है।

 गलत किया हमने ही। खूब कुत्ते, बिल्ली, चमगाधडो को मारकर खाया। जब वायरस फैला और लोग मरने लगे तब जानकारी दुनिया से छुपाई। गलती आदमी की है और दोष भगवान को देते है। चीनी तो भगवान मानते ही नही। उन्होने कोरोना दिया और उसे अपने देश में फैलने से रोक दिया। हम नियमो का पालन नहीं करेंगे और पकड़ेंगे भगवान को। उसका काम तो ठीक ही चल रहां है। लेकिन ज्यादातर लोग कुछ अलग सोचते है। इस वायरस से जितने लोगों की मृत्यू हुई है वह आंकड़ा दुनिया की आबादी के आगे बिलकुल नगण्य है। दुनिया के लगभग आठ सौ करोड लोग अभी जिंदा है यह किसकी कृपा है, ऐसा सोचकर खूद को पॉझिटिव रखने वालो कि तादात ज्यादा है। भगवान पर शक कर सकते है लेकिन फिर खूद पर तो भरोसा कर ले ?
दिल सच्चा और चेहरा झूठा...
दिल सच्चा और चेहरा झूठा...

सोमवार, 29 जून 2020

योगगुरू स्वामी रामदेव की जय हो...

थोडा रुक जाते तो अच्छा होता
थोडा रुक जाते!
हमारे प्रधानत्री मोदी जी को उनके समर्थको ने विश्वगुरु मान लिया है। दूसरी ओर हमारे बाबा स्वामी रामदेव विश्व में योगगुरु का सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। इसमें पहली बात विवादित हो सकती है, लेकिन दूसरे दावे में बेशक दम है। मोदी जी विश्व गुरू बने हो या नही लेकिन वे योगा के भक्त हैं इस संदर्भ में कोई विवाद नहीं है।

मोदीजी को योगा पसंद हैं और योगगुरू स्वामी रामदेव  मोदी जी को पसंद करते हैं। शायद योगा का ही धागा रहा होगा, इसीलिए दोनो के आपस में अच्छे संबंध है। दोनो में सबसे बडी समानता यह है कि वे माहौल बनाने में माहिर है। लोग दोनों से ही बड़ी उम्मीदें लगाए रखते है क्योंकि उनके सपने और दावे बड़े होते हैं।

दवा मिली, नहीं मिली!

खास तौर पर भारतीय लोगों ने कोरोना की आहट से लेकर अभी तक मोदी जी और बाबा जी से बड़ी उम्मीदें पाल कर रखी थी। लग रहा था दोनों मिलकर इस संकट का रामबाण जरूर निकालेंगे। कुछ जुगाड़ तो होकर ही रहेगा! दोनों के प्रति जुडी श्रद्धा के कारण लोग इंतजार करते रहे। आखिरकार अचानक एक दिन दुनिया को कोरोना की दवा मिल गई, नहीं दे दी गयी। बाबाजी ने अपने जादुई पोतडी से एक कीट निकाल कर दुनिया के सामने रख दिया। डाक्यूमेंट्स का पता नहीं चला और तुरंत दवा का असर उतर गया। विशेष यह हुआ कि मोदी जी की आयसीएमआर ने दवा को पहचानने से ही इनकार कर दिया। इसके कारण बाबा जी की निराशा हुई, यह उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। बडी चीज कां शगून ठीक नहीं हुआ।

कोरोना विश्व के लाखों लोगों को निगल गया है। वैक्सीन के लिए दुनिया अरबों रुपए और समय खर्चा कर रही है। भारत में भी हजारों लोग करोना की भेंट चढ़ चुके हैं और आजतक 5 लाख से ज्यादा लोग उसकी चपेट में आए हैं।  सारी दुनिया उपाय के पीछे लगी है। ऐसे में जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ। बाबा जी ने 15 दिन पहले से ही चैनलों पर योगा के पाठ सिखाना शुरू कर दिया था। तभी कुछ शक हो रहा था कि बाबा कोई धमाका तो नहीं करेंगे? और धमाका हो गया लेकिन पटाखों की आवाज कहीं पर गूंजी नहीं। कुछ पता ही नहीं चला कि किसकी मान्यता लेकर और किस पर प्रयोग चला कर दवाई का दावा किया गया। अच्छा हुआ कि सरकार ने ऐन मौके पर हाथ झटक दिए; नहीं तो सब तरफ से जल्दबाजी का आरोप लगता। बाबाजी तो दावा किया तबसे दिख ही नहीं रहे हैं।

बाबा जी का योगदान

योगा पहले भी था लेकिन बाबा जी ने खुद को उदाहरण बनाकर उसे लोकप्रिय बनाया। उसी माध्यम से पतंजली आयुर्वेद का भी बडा संसार खड़ा किया। शुद्धता की गारंटी देकर  अन्य अनेक खाने पीने की चीजों का उत्पादन वे बड़ी मात्रा में कर रहे है। उसे खास ग्राहक पसंद करते है। उन्हीं की दम पर बाबा जी अपने प्रतिस्पर्धीयोको शीर्षासन करवाने का दम भी भरते हैं। कुछ सेवा प्रकल्प भी वे चला रहे हैं। उनका देश में ही नहीं दुनिया में बड़ा मान-सम्मान है। वे स्वदेशी के वाहक है। कठोर परिश्रम के बल पर योगा और उद्योग कां ऐसा मेल उन्होंने करवाया कि पैसा तो मिला ही, साथ में देश को नई पहचान दिलाने काम उन्होने किया है। शायद उसी से आत्मविश्वास बढा, जो आज ज्यादा ही बढ़ गया है। कोविड का बाजार हथियाने के चक्कर में थोड़ी जल्दी हो गई। जल्दी की तो कम से कम दवा को दुनिया में लाने से पहले उसकी प्रक्रिया और नियमों का पालन करते तो आज हर किसी की जुबां पर उन्हीं का नाम होता।

लेकिन बाबाजी को डरने की जरा भी जरूरत नहीं है। आखिर आयुर्वेदिक दवा ही तो है और चमत्कारी दावों की छूट आयुर्वेदिक के सिवा किसी को भी नहीं दी जा सकती। वैसे बाबाजी के पास एक अच्छी फैसिलिटी है। दवा से बीमारी दूर ना हो तो योगा करो और योगा से फायदा ना हो तो गोली लो, ऐसी सुविधा दूसरे पॅथी में नहीं है। अभी इसे भारत में ही लांच किया गया यह अच्छा हुआ।

योग के माध्यम से भारत के घर-घर में पहुंचने का कर्मयोग बाबाजी साध चुके है। भारत में योगा और आयुर्वेद परंपरा का हिस्सा रहा है। लेकिन उसके प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने का श्रेय नि:संशय रामदेव बाबा को जाता है। योग से साधक को समाधी का आनंद प्राप्त होता है। ज्यादातर संत एकांत और अपनी ही दुनिया में जीने के आदी होते हैं। लेकिन बाबाजी ने योगा के साथ आयुर्वेद का प्रसार प्रचार करते हुए, उसे एक व्यावसायिक प्रतिष्ठा दिलवाने का काम भी किया है। पतंजलि उद्योग समूह के रूप मे एक संत के पुरुषार्थ की नई मिसाल कायम की है। वे फकीर संत नहीं, एक साम्राज्य के धनी हैं।  बस दुनिया में तहलका मचाने का उनका ख्वाब अभी पूरा ना हो सका।

पीछे हटना नहीं

बाबा जी की दवा का असर दिखना अभी बाकी है। 3 दिन में कोरोना का पेशेंट ठीक हो जाएगा यह बाबाजी का दावा है। यह सच हो जाए तो आज बाबा जी जीते जी भगवान बन जाएंगे। कोरोना से मरने वालों का सिलसिला यहीं पर रुक जाएगा।भगवान करे कि उनकी दवा का लोगों पर जल्दी असर हो। डर के इस माहौल से बाहर निकल कर लोग चैन की खुली सांस ले सकें। सभी यहीं चाह रहे हैं। इसीलिए बाबा जी को जरा भी पीछे हटना नहीं चाहिए।

कोविड 19 से दुनिया की तुलना में भारत का थोडा कम नुकसान हुआ है; इसका कुछ श्रेय योगगुरू बाबा रामदेव जी को देना  पड़ेगा। पहले लोगो ने केवल किताबों में हीं योगा देखा-पढां था। गरिबी-अभाव था, लेकिन जो भी खाते उसमे सत्व था। लेकिन वैश्विकीकरण आया, पैसे कां चलन बढां, खान-पान, चाल-ढाल बदली, स्पर्धा आयी, आदमी की स्पिड तेज हो गई, इसलिए तनाव भी बढ़ा। इस के पीछे तरह के डिसीज आये। चारो ओर तरक्की दिखने लगी लेकिन आदमी अंदर से खोखला होता गया।

तरक्की तो दिख रहीं थी लेकिन उसके साथ आयी भिन्न मनो-शारीरिक बिमारियो से लोग त्रस्त थे। सब तरफ स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हुई है, रिसर्च में गहराई आयी है। अरबों का बजेट दुनिया स्वास्थ्य पर खर्चा करती है। लेकिन फिर भी आदमी पागल-बिमार हुवा जा रहां है। ऐसे में किसी गांव से आये बाबा ने लोगो का विश्वास जीतकर उनके बीच योगा की चाह पैदा करवाई। बाद में भूलाए गए आयुर्वेद को मेन स्ट्रीम मे लेकर आए। वहां से बाबाजी का ग्राफ चढ़ता ही गया। अभी बहुत सारे लोग भारत में कई सालों से योगा कर रहे हैं। श्वसन संस्था पर हमला करने वाले कोविड-19 को रोकने में योगा से बढ़ी हुई प्रतिकार शक्ती काम दे रही है। निश्चित ही इसका श्रेय स्वामी रामदेव को भी जाता है।
कुछ करेंगे
रुकना मत

बाबा का ही करिश्मा है कि बडी संख्या में लोग आयुर्वेद को अपना रहे हैं। कई बार आयुर्वेदिक के दावे और उसके प्रतिफल में मेल नहीं बैठता। करोना के इस दौर में आयुर्वेद कुछ कर पाता तो भारत का नाम दुनिया में रोशन हो जाता। चारों ओर से पैसा बरसता तो रोज पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाने की नौबत ना आती!

 अब हम दुआ ही कर सकते हैं कि चीन के साथ बॉर्डर पर गोली ना चले और कोरोना वायरस पर बाबाजी की गोली चल जाए। एक हालात मोदी जी की परीक्षा ले रहे हैं तो दूसरी ओर स्वामी रामदेव की दवा दांव पर लगी है। भारत के लोग बहुत झेल चुके हैं। अब जो भी हो अच्छा हो!






शुक्रवार, 19 जून 2020

चीन के गुलाम आत्मनिर्भर कैसे बनेंगे ?

सभ्य लोगों की दुनिया मे 
धोखेबाज ड्रैगन
डर कां माहौल है। कोविड 19 कहर ढां रहां है। पुलिस, सरकारी यंत्रणा, स्वास्थ्य यंत्रणा दबाव में है। दबाव होगा ही, क्योंकि इतना काम करने का वक्त कभी
आयेगा यह सोचा नहीं था। अव्यवस्था काफी है। पेशंटस् बढते जा रहें है। सुधर नहीं रहां है।

 इंतजार हो रहां है कि कोई तो इलाज खोज लेगा। युरोप-अमरिका के पास सारे संसाधन है, पैसा है, उच्च कोटि के वैज्ञानिक है, फिर भी वह थक गए। भारत भी कोशिश कर रहा है। लेकिन हमेशा की तरह तरह जुगाड़ू इलाज से बात नहीं बनने वाली नहीं है। इलाज पक्का चाहिए। मोदी जी भी समझते होंगे। इसलिए उन्होने भी
कोरोना का प्रतीक
अब कोरोना पर पब्लिकली बोलना छोड़ दिया है। उनके एक समर्थक स्वामी रामदेव कोरोना पर दवा ले आए, लेकिन दवा लॉन्च होते से ही विवाद हो गया। दुनिया को चौंकाने का तंत्र अभी काम नहीं करेगा। पता नही लोगो को अभी  कितनी लंबी प्रतीक्षा करनी है।

प्रकृती भी खफा है। हलके ही सही भूकंप के धक्के इशारा दे रहें है। बीच में ही टिड्डीया आयी और किसानो कि फसल को नुकसान हुआ। यह तो प्राकृतिक संकट रहां लेकिन आदमी ही नही देशो के भी दिमाग खराब होते जा रहे हैं। धोखेबाज चीन को युद्ध की दुर्बुद्धी हो रहीं है।
पाकिस्तान की मित्रता कां
शायद चीन पर असर हुवा है; अन्यथा यह पत्थरमार पेटर्न चीनी जवानों में कहां से आ गया?

अबतक एलएसी पर चीन और भारत के जवानों में धक्कमधक्की देखी-सुनी गई थी। अब शस्त्र संधी कां पालन तो हो रहा है लेकिन पत्थर, डंडे, चाकू, रॉड से हमला करके जवानों को मार दिया जाए, ऐसा युद्ध समझ के बाहर है। चीन धोखेबाज, बेइमान है।

विदेश नीति तो आम आदमी के दिमाग के परे है। वह तो सरकार और उसके लोग ही जाने। लोग अपनी क्षमता से सोचते है। चीन आज गलवान वैली मे घुसा है, तब हमे उसके सामान पर बहिष्कार की बात सूझ रहीं है। चीन अपना
काम की बात
यहां बैठा है
चालबाज चीन
सामान लेकर दशकों से हमारे घर में घुसकर कब्जा जमा चुका है। अब अचानक उसके सामान पर बहिष्कार की बांत जोर-शोर से उठने लगी है।

भारत चीन से निर्यात की तुलना मे चार गुना आयात कर रहां है। भारत के लोगों को चीनी माल की चटक लग चुकी है। लगभग जरूरत की हर चीज सस्ते मे चीन से हमारे घर में पहुंच रहीं है।
 जो लोग आज आंदोलन कर रहे हैं वह भी उनकी ही वस्तुओं का इस्तेमाल करते हैं। सरकार लोगो को क्यों कहती हैं? इंपोर्ट कम करे। लेकिन देश में जो अरबों का चीनी माल पड़ा हुआ है उसका घाटा क्या व्यापारी उठाने को तैयार है? उद्योगपतियों का इतना सारा पैसा चीन से व्यापार में फंसा हुआ है। क्या उन्हें सरकार समझा पाएगी? तो फिर लोग जिनपिंग की अंत्य यात्रा निकालकर क्या संदेश दे रहे हैं?

कोरोना कां सच छुपाने के कारण चीन की दुनिया मे छी-थू हो रही है। युरोप- अमेरिका चीन पर खफा है।आएदिन चीन को सबक सिखाने की बातें हो रही है। उस पर आर्थिक निर्बंध लगना शुरू हो गया है। ऐसे में इतना बड़ा ग्राहकों का बाजार यानी भारत आत्मनिर्भरता की बात करें यह चीन को बर्दाश्त नहीं हो रहा है। दस देशों की आबादी भारत में बसती है। भारत चीन की बनी बनाई दुकान है। उससे वह खोना नहीं चाहेगा। इसी लिए दबाव बनाए रखना चाहता है। इसलिए उसकी खुराफात चलती रहेगी। कोरोना के इस संकट काल का मुहूर्त खोज कर चीन होशियारी कर रहा है। लेकिन हमारे जवान बॉर्डर पर मुस्तैद है। सीमा की रक्षा का तो वह संभाल लेंगे लेकिन क्या भारतीय आम आदमी उसमें हाथ बटाएगा, यह असली सवाल है।

 चीन को आर्थिक धक्का देने के लिए केवल व्यापारी ही नहीं आम लोगों को भी कुछ त्याग करना पड़ेगा।
आत्मनिर्भरता के नाम पर जो स्वदेशी को बढ़ावा देने की बातें हो रही है उसमें कितना दम है? हमारे व्यापारी तीन सौ रुपये कां एलईडी बल्ब बेच रहे थे, तब चीन तीस रुपये का बल्ब लाया था। हम इससे कैसे निपटेंगे? क्या चीन से निकली हुई कंपनियां सच में भारत में आ रही है? या दूसरे देशों में जा रही है? चीन अब केवल सस्ते माल के लिए ही नहीं अपितु क्वालिटी प्रोडक्ट के लिए भी जाना जा रहा है। क्या हम उससे स्पर्धा करने वाली चीजें पैदा कर पाएंगे? कई सारे सवाल है। लेकिन मोदी जी ने सर्वदलीय बैठक में चीन को ठीक करने का वादा किया है; उस पर देशवासियों को विश्वास करना चाहिए।

कोरोना भी चीन कां ही बच्चा है, पहले उससे तो दुनिया निपट ले। पहले उसे भगाना है। बाद में चीनी वस्तुओं का देखा जाएगा। तब तक दबाव की यह राजनीति चलती रहेगी। दुनिया चीन को डराएगी और चीन हमको। 140 करोड़ भारतीयों का बाजार उसे खोना नहीं है। उससे हम कैसे निजात पाएंगे?
मेड इन चायना
डिपेंडेंट भारत इंडिपेंडेंट कैसे बनेगा इसका गवाह बनने का मौका हमें मिले तो उससे बड़ा सौभाग्य दूसरा नहीं हो सकता। गुलामी से मुक्ती होगी तभी तो आत्मनिर्भर बनेंगे!










सोमवार, 15 जून 2020

भारत को डिप्रेशन क्यो नहीं होता ?

माना कि कोरोना विषाणू ने दुनिया के हर आदमी पर असर डाला है; लेकिन भारत की बात हीं कुछ और है। हमने इसे
बिलकुल भी गंभीरता से नहीं लिया है।

लॉकडाउन में पुलिस के डंडे पड़े तब लोग घर में दुबके। कहां जा रहा है कि पहले से आज लॉक डाउन की ज्यादा जरूरत है। लेकिन पहले लॉकडाउन नहीं होता तो आज उसकी जरूरत ही नहीं होती, इतना कोरोना घर घर में बस गया होता।  भारत के हालात युरोप-अमरिका से भी बदतर होते।

 जल्दी लॉकडाउन हुआ तो ठीक ही हुआ। सहीं कहें तो मौत की यहां कोई कीमत ही नहीं है। गरीब भारत की जेबे खाली है। उन्हें जीने- मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता. पैसे
वालों को जरूर चिंता है। खास तौर पर उनकी जान अधर में लटकी है जिन्होंने फोर्बज् की लिस्ट में आने के लिए जीवनभर जाने कितने पापड़ बेले है।
कोरोना पिक पर है और कहीं पर चुनाव की सरगर्मियां तेज होने लगी है। कोई टेंशन नहीं है।
ऐसा पोज कभी मत देना
गलत पोज
यहां किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. लोग मर रहे हैं,  हॉस्पिटल में पेशंट्स के पड़ोस में लाशें पड़ी है; लेकिन कोई पैनिक नहीं है. लगभग सारे एमपी,  एमएलए, अनगीनत मिनिस्टर, हजारों पार्षद जान बचाकर अपने घरों में बैठे हैं। आम लोग मौका मिलते ही रास्ते पर आ जाते हैं। एकदम बढ़िया चल रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष घर पर है। लोग घर में हो या बाहर अपने बलबूते पर जिंदा है।

पांच-सात सौ तो वैसे भी रोज मरते है, ऐसा बेफिक्री वाला एटीट्यूड जहां पर है, वहां दुनिया की तुलना में मोर्टालिटी रेट कम होना लाजमी है।

और सहीं भी  है। रोड एक्सिडेंट में हीं सालाना डेढ लाख लोग दम तोड देते है। किसानो का मरना रोज की बात है। लॉकडाउन में प्रवासी मजदुरों को तो रोज मरते-कटते देखा होगा। मौत को यहां सिर्फ आंकड़ों में देखते हैं।

मौका मिलते ही रास्तों पर इतनी भीड़ दिखने लगती है। डर पुलिस का है, कोरोना का नहीं।

यहां है डिप्रेशन

अभी एक गुणी अभिनेता सुशांत सिंह के मृत्यू कां बडा हीं दुखद समाचार आया है। इस समय कोई गुजर जाए, तो कोरोना पर शक होता है। लेकिन  आत्महत्या बतां रहें
है। असली कारण कां बाद में पता चलेगा। तब तक डिप्रेशन पर माध्यमों ने चर्चाएँ होती रहेगी । सुशांत न्यू इंडिया के प्रतिनिधि थे। यह इंडिया समृद्ध है। उसके पास सारी सुविधाएं हैं। पैसा है, बंगला है, गाड़ी है। इज्जत है। शोहरत है। सारी ब्यूरोक्रेसी उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ी है। फिर भी डिप्रेशन है। सबकुछ पाकर किस चीज की निराशा है? क्यों अकेलापन है? इस अगडे इंडिया कां धीरज जवाब दे रहां है...  यही इंडिया पिछड़े भारत को मोटीवेशनल लेक्चर्स बेचता रहता है। उन्हीं की हिम्मत जवाब दे रही है। अजब न्याय है!

यहां नही है डिप्रेशन
नो डिप्रेशन
नो डिप्रेशन!

जरा उस भारत कि तरफ देखो भाई! कोरोना के इस संकट काल में इनके संसार रास्ते पर आ गए हैं। इनके रोजगार गए हैं। यहां लाचारी है लेकिन जीने की जिद नहीं छुटी है। वो लॉकडाउन के बाद शहर में परिवारसमेत फँस गया। उसने परिवार को सैकड़ों किलोमीटर ढोया। ऐसा पैदल प्रवास शायद ही इतिहास में कभी हुआ है। पैर फटे लेकिन हिम्मत नहीं टूटी। लाखों मजदूरों का भविष्य खतरे में है लेकिन कहीं पर भी डिप्रेशन नहीं है। उसकी सहनशीलता, उसके उम्मीद का दायरा बड़ा है। उसकी क्षमाशीलता लाजवाब है! सलाम है उस मजदूर को!
घर वापसी को निकले मजदूर
घरवापसी





गुरुवार, 16 जनवरी 2020

वोटरों की 'घरवापसी' के संकेत...

मोदी जी
इस देश कां डीएनए कांग्रेस कां है. कभी लोग उनसे नाराज हो जाते हैं. तब कहीं बीजेपी को मौका मिलता है. लेकिन
अचरज हुआ है. मोदी जी दोबारा प्रधानमंत्री बने.
कांग्रेस की तुलना में दूसरी किसी भी पार्टी को दो-चार गुना अधिक काम करना पड़ता है. तब कहीं उसकी दाल गलती है.
कांग्रेस का चुनाव चिन्ह

अभी एनआरसी और कॅब के बहाने कांग्रेस रस्ते पर है. लेकिन यह उनका आंदोलन नहीं है; उधार का- मुफ्त कां- रेडिमेड आंदोलन है. इस सरकार को भगाने की जल्दी कांग्रेस से ज्यादा दुसरो कों है. जो अभी रस्ते पर उतरे है उनके चेहरे पर वह तडफ देखी जा सकती हैं.

कांग्रेस कों कम्युनिस्ट, मुस्लीम और कुछ दलितों कां कंधा मिला हैं. मुफ्त में. नहीं तो तीन सौ रुपये रोज से लोग लाने पड़ते हैं. वह उनके नेताओं से हो नहीं सकता. कांग्रेस के पास निष्ठावान वोटर है लेकिन निष्ठावान कार्यकर्ता नहीं बचा है. बीजेपी के पास दोनो हैं.

कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी पार्टी है. कांग्रेस मुक्त भारत कां नारा बीजेपी ने दिया था. वह काम कर गया क्योंकि लोग कांग्रेस से काफी नाराज थे. वक्त बित रहां है, वैसे बीजेपी की खास तौर पर उनके द्वारा शासित राज्यों की कमियाँ उजागर हो रहीं हैं. मोदी जी के नाम से वोट मिल सकता है; लेकिन कोई खुदको हीं मोदी समझ ले तो फिर शामत आ सकती है.

वोटरों की 'घरवापसी'

पहले जो कांग्रेस के साथ हुआ वह बीजेपी के साथ हो रहां है. एकेक राज्य अब बीजेपी के हाथों से छूटता जा रहा है. इससे ऐसा लग सकता है कि बीजेपी की उल्टी गिनती शुरू हो गई है. लेकिन मोदी जी का जादू बरकरार है. विपक्ष के लिए यहीं सबसे बड़ा चिंता का विषय है.
सीएए-एनआरसी पर लोग मैदान में उतरे
 सीसीए-एनआरसी पर लोग मैदान में उतरे

पिछले दिनों बीजेपी को पांच राज्यों में हार का मुंह देखना पड़ा और बगैर कोई संघर्ष के कांग्रेस को जीत मिली है. इस देश का ओरिजिन कांग्रेस है. दुसरे पक्ष से गलती हुई कि लोग 'घरवापसी' के लिए निकल पड़ते है. राज्यो के चुनावो में बीजेपी से गलतीयाँ हुई है. बीजेपी कां जीत का प्रतिशत 70 से 40 फिसदी तक उतर चुका है. क्या सच में वोटरों की घर वापसी हो रहीं है?

  एमपी में शिवराज सिंह चौहान का अपवाद छोड़ दिया जाए तो राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, झारखंड के नेतृत्व पर अति विश्वास के परिणाम बीजेपी भुगत रही है. इन राज्यों में पार्टी के अंदर हीं मुख्यमंत्री से नाराजी व्याप्त थी. केंद्र में उन्ही की सरकार है, उसका लाभ राज्यो को मिला है. फिर भी पाँच चुनाव हारे? बहुत नाइंसाफी है.

कहीं  आदिवासी- गैर आदिवासी कां मुद्दा ले डूबा तो कहीं पुराने दोस्तो ने विश्वासघात कर दिया. हरियाणा में जाट-गैरजाट के चक्कर में खट्टर बच निकले. पार्टी कां अंतर्गत अनुशासन गड़बड़ा रहां है. महाराष्ट्र में उपेक्षित नेता खुलकर बोल रहें है. हाई कमांड की अनदेखी हो रहीं है. परिणामत: सत्ता से हाथ धोने की नामुश्की आयी. केंद्र सरकार भले ही मजबूत हो, राज्यों में हो रहां नुकसान  बीजेपी को कुछ इशारा कर रहां हैं.
देवेन्द्र फडनवीस
देवेन्द्र फडनवीस

हार हुई वहां बीजेपी के मुख्यमंत्रियों ने विपक्ष से ज्यादा अपनों कां बंदोबस्त करने में शक्ती जाया की. मुख्यमंत्री को जरुरत से ज्यादा खुली छूट दी गयी. उन्होंने 'विनेबिलिटी' के चक्कर में कांग्रेस के नेताओं की मेगा भर्ती कर ली. जिससे पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता और नेता नाराज हो गए. राज्यों के नेता खुद को मोदी समझने की भूल कर बैठे. आवेश मे 'मै फिर बीजेपी आऊंगा, मै फिर आऊंगा' मुठ्ठी पटककर कहने लगे. लोगों कों पसंद नहीं आया.

फडनवीस का आज भी मजाक बनाया जा रहा है. दोस्तो को संभाल नहीं पाएँ और दुश्मनों को गले लगाया. इसलिए महाराष्ट्र गया. फडणवीस, दास इनके कार्यशैली पर पार्टी के अंदर ही असंतोष की भावना पनप रही थी और है. उसे ढंग से एड्रेस नहीं किया गया.

महाराष्ट्र में कांग्रेस के नेताओं ने पूरे पाँच साल गहरी नींद ली. उन्होंने कुछ भी नहीं किया. साठ सालों तक सत्ता में थे तो नेचरली सत्ता का मद उतरा नहीं हैं. प्रचार शरद पवार जी ने किया और कांग्रेस के बैठे-बिठाए 45 एमएलए चुनकर आ गये.
तीन पार्टियों की सरकार. उद्धव ठाकरे, शरद पवार और मल्लिकार्जुन खरगे
महाराष्ट्र में इन्होने जुगाड बनाया. उद्धव ठाकरे, शरद पवार और मल्लिकार्जुन खड़गे

कोई नहीं कहता था कि झारखंड में कांग्रेस है. लेकिन वहां पर भी कांग्रेस की अच्छी सीटे आयी. छत्तीसगढ़ में किसी ने कांग्रेस की इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं की थी. वहां बीजेपी बह गई. एमपी, राजस्थान में भी कांग्रेस वाले आपस में लड़ते रहे. फिर भी लोगों ने उन्हें चुनकर दिया.

क्या सच में वोटर घर-वापसी कां मन बना रहें हैं?  राज्यो में करारी हार के बाद लोगों ने लोकसभा चुनाव में फिर से कमल का बटन दबाया. यह कैसे हुआ? अभी विपक्ष के पास मोदी जी कां पर्याय नहीं है. वे राष्ट्रीय नेतृत्व खड़ा नहीं कर पा रहें हैं.

 लेकिन बीजेपी को भ्रम में नहीं रहना चाहिए. लोगों के पास पर्याय था है और रहेेेगा. कांग्रेस को कुछ करने की जरूरत नहीं है और ना ही वह कुछ करने वाले हैं. कांग्रेस को भरोसा है, सत्ता अबतक आयी वैसी हीं अपने आप आयेगी.

 एनआरसी, सीएए उनके लिए बोनस है. उसके विरोध में उन्होंने संसद में कुछ नहीं किया. ज्यादा तो कम्युनिस्ट तड़प रहे है.  मुस्लिमो ने उसे अस्तित्व कां मुद्दा बना डाला है. तीन तलाक़ पर इतराने वाली बीजेपी देख रहीं है कि हजारों मुस्लिम औरतें इस सरकार से आजादी मांग रहीं हैं.
मोदी सरकार का विरोध
पूरे देश में मुस्लिम महिलाओ ने आंदोलन में बढ- चढकर हिस्सा लिया


पूरी हयात कांग्रेस पर मुस्लिम अनुनय का आरोप लगाने वाली बीजेपी भी मुस्लिमों कों खुश करने के लिए बहुत कुछ कर रही है. हज कोटा भी बढ़ा रहीं है. अल्पसंख्यक मंत्रालय भी ध्यान दे रहां है. मोदी जी विपक्ष के हर सवाल कां जवाब तो नहीं देते. लेकिन एनआरसी, कॅब पर हर मंच पर मुस्लिमो को आश्वस्त कर रहें है कि तुम्हे कुछ नहीं होगा. अब मुस्लिम अनुनय कां आरोप तो कांग्रेस ने बीजेपी पर लगाना चाहिए.

दिल्ली अब दूर नहीं...

कम्युनिस्ट, मुस्लीम संघटनाए, 'आप' और कुछ दलित जंग-जंग पछाड़ रहें है कि सीएबी-एनआरसी को इतना भुनाया जाये कि बीजेपी डूब जाये. लेकिन उसके लिए देश साथ में चाहिए. वह होता दिख नहीं रहा है. एनआरसी के बहाने दिल्ली भी धदकती रह जाये तो कांग्रेस और 'आप'को फायदे की उम्मीद है.
मुस्लिमों कां केजरीवाल को भारी समर्थन
 मुस्लिमों कां केजरीवाल को भारी समर्थन

दिल्ली का चुनाव सब को फायदा पहुंचाने वाला है. बीजेपी और कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं हैं. आप को सबका बाप बने रहना हैं. बीजेपी को तीन से आगे बढ़ना है और कांग्रेस को अंडा फोड़ना है.

दिल्ली कां चुनाव अभी से आप के लिए एकतर्फा बताया जा रहां है. इतना कि सेफोलॉजिस्ट कों भी कोई पूछ नहीं रहां है. देश में बने माहौल का कुछ फायदा कांग्रेस कों भी तो होगा.  उससे आप की ताकत कम होगी. सारे देश में कांग्रेस का विरोध करने वाले बीजेपी कों दिल्ली कांग्रेस से बहुत मोहब्बत है. कांग्रेस के फायदे के लिए बीजेपी चिंतित हो यह दृश्य यहीं पर दिखाई दे सकता है.

केजरीवाल ने ताकतवर बीजेपी को दिल्ली में रोक दिया, इसकी बड़ी तारीफ होती है. अन्ना आंदोलन में एक इमानदार चेहरा बनकर केजरीवाल उभरे थे. लेकिन वह चेहरा राजनीति में काम कां नहीं था. उन्हें पहले झूठ कां ट्रेनिंग लेना पड़ा, तब कहीं वे भारतीय राजनीति में बीजेपी और कांग्रेस के आगे टिक पाए. बस शर्त इतनी है कि 'मन की बात फेकम् फांक' में सफाई चाहिए.


 कॅब और एनआरसी मामले में देशभर हल्ला मचा है. उसका सेंटर दिल्ली ही है. कांग्रेस, कम्युनिस्ट, मुस्लिम और कुछ दलित तबका रस्ते पर है. उनके बच्चे कुछ भी कहें लेकिन वे बीजेपी से ही 'आजादी' मांग रहे हैं. उसका फायदा 'आप'को होने कां अंदाजा लगाया जा रहा है. लेकिन इसका दुसरा पहलू भी है. चुनाव तक ऐसे हीं चलता रहां तो ऐन मौके पर यह चुनाव हिंदू-मुस्लीम पर उतर सकता है. सोशल मीडिया पर वही चर्चाएं करवाई जा रही है.
केजरीवाल की जनसभा
केजरीवाल की जनसभा

इस आंदोलन से दिल्ली के ट्राफिक पर असर देखा जा सकता है. जाम लग रहां है. आप के राज में आम लोगों को तकलिफ पहुचे इसका लाभ बीजेपी को जरूर होगा. वैसे भी पिछली बार का सक्सेस रेट फिर से पाना 'आप'के लिए मुश्किल तो हैं ही. बीजेपी 3 से 23 पर छलांग लगा सकती हैं. कांग्रेस के परफॉर्मेंस की सबको चिंता है. कांग्रेस के वोटरों की 'घरवापसी' हो जाए, इसके लिए बीजेपी ने होम- हवन शुरू कर देना चाहिए.
केजरीवाल की लोगों पर पकड़ है
केजरीवाल की पकड़ है
भारत में समस्याएं अनंत है. 'इकोनामी के हालात कमजोर है; लेकिन फंडामेंटल मजबूत है' यह घिसा-पीटा जुमला बचाव में खडा किया जा रहां है. हालात कंट्रोल  के बाहर है. इसलिए भावनिक राजनीति एक अपरिहार्यता बन गई है.
बीजेपी से लोग काफी नाराज़ है, यह बात कांग्रेस बताए यह उनका धर्म है. लेकिन छत्तीसगढ़ के बाद झारखंड की दूसरी बड़ी ऐसी हार है जिसने बीजेपी का मुंह हरा- नीला कर दिया है. मोदी जी को हटाने के लिए क्या इतना काफी है?
मोदी जी

मोदी जी कां औरा खत्म हीं नहीं हो रहां है... विपक्ष को चिंता खाएँ जा रहीं हैं.

सोमवार, 23 सितंबर 2019

मोदी जी विश्व गुरू बन चुके हैं...

अमेरिका के ह्युस्टन में मोदी जी ने समर्थकों को ऐसे झुककर अभिवादन किया.
आखिरकार भारत के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अमेरिका में अपना विश्वरूप दर्शन दिखा हीं दिया. उनका यह रूप देखकर 50 हजार से ज्यादा संख्या में वहां बैठे अमरिकी भारतीय भावविभोर हो गए. कईयों के आंखों से आंसू छलक आए. पूरी दुनिया के लोगों ने बगैर पलक झपकाए यह नजारा देखा. भारतीय लोगों के खुशी का तो ठिकाना नहीं था. बड़ा ही अद्भुत नजारा था.

 सच में मोदी जी खिलाडीयों के खिलाडी है. अभी अमेरिकी चुनाव होने को वक्त है, लेकिन विजय की रैली कैसी होती है उसकी झलक उन्होंने ट्रंप को अभी से हीं दिखा दी है. कोई बड़ा मैच जीतने के बाद जिस तरह से सारे खिलाड़ी ट्रॉफी लेकर स्टेडियम का चक्कर लगाते हैं, वैसे ही मोदी जी ने ट्रंप का हाथ कस कर पकड़ के चक्कर लगाया. मानो सारे विश्व पर विजयी परचम लहरा दिया हो. यह दृश्य देखकर सारी दुनिया ने दांतो तले उंगलियां दबा ली होगी. ऐसा लग नहीं रहा था कि अमरिका कां प्रेसिडेंट दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी है. वह मोदी जी के पीछे घसीटे जा रहां था. मोदी जी की जय हो! विश्व गुरु जिंदाबाद!

विश्वगुरु मोदी जी संबोधित करते हुए.
  एक तरफ अमेरिका में मोदी जी के जयकारे लग रहे थे और दूसरी तरफ मोदी जी के फेल होने का इंतजार करते-करते थके हुए कांग्रेसी हाथ पर हाथ मल रहे थे. लेकिन उन्हें पता नहीं है कि हाथ पर हाथ मलने से और मुठ्ठिया पटकने से किसी का सत्यानाश नहीं होता. या तो संघर्ष करो या फिर दुश्मन से सीखो, यही रास्ता है. कांग्रेसी दोनों काम नहीं कर रहे हैं. सच में कांग्रेसियों को मोदी जी से कुछ सीखना चाहिए. भारत में कोई दो पैसे नहीं लगा रहा है. न्याय, पुलिस व्यवस्था खत्म हो चुकी है. गुंडे हीं अब न्याय कर रहे हैं. यही समझिए कि गुंडों की समांतर न्याय व्यवस्था चल रही है. न्याय के लिए लोग पुलिस की बजाय गुंडों पर विश्वास कर रहे हैं. सरकारी बाबुओं का भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है. इसी से समझ लीजिए कि नोटबंदी के दौरान घोटालों में पकड़े गए बैंक कर्मचारियों पर क्या कार्रवाई हुई इसका कोई आंकड़ा आज तक सामने नहीं आया है. लेकिन मोदी जी की तरह सारे नेता कहते हैं- ना खाऊंगा ना खाने दूंगा! भ्रष्टाचार के बजाय जो विरोध में बात करेगा उसके प्रति जीरो टॉलरेंस दिख रहा है.

आरक्षण तो ऐसा विकराल रूप धारण कर चुका है कि न्यायाधीशों के दिमाग भी चकराने लगे हैं. सुप्रीम कोर्ट के जज भी रस्ते पर आकर न्याय की भीख मांग रहे हैं. अर्थव्यवस्था खड्डे में जा रही है; लेकिन हमारा देश विश्व गुरु बन गया है.चमत्कार है! पहली बार ऐसा हुआ है कि केवल नेता के भाषणों पर कोई देश ऊंचाइयों को छू रहां है.
मोदी जी ने ऐसे हाथ दिखाया तो तालियां गूंज उठी
वैसे भी यह आभासी युग है. भारत में तो सारा युवा वर्ग नेट से चिपका रहता हैं. यह तो अच्छी बात होनी चाहिए. लेकिन असलियत यह है कि इनका समय नॉलेज बटोरने की बजाए टाइमपास में गुजर रहा है. व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर पर यह युवक ज्यादातर भड़काऊ बातें या लैंगिक विषयों पर लिखते रहते हैं. ना उन्हें रोजगार का खयाल है ना अपने भविष्य की चिंता. बस आभासी दुनिया में जी रहें हैं.

ऊपर से कल 'हाउडी मोदी'के उपलक्ष में हमारे प्रधानमंत्री जी ने कह भी दिया कि भारत में सब ठीक चल रहा है. सबके मुंह बंद है. कांग्रेस मरी पड़ी है. बचा विपक्ष गालियां खा रहा है. पत्रकार लोगों की समस्याओं पर मौन साधे हुए हैं और सत्ता का गौरव गान कर रहे है. मतलब भारत में सब ठीक चल रहा है.

भारत मंदी के परिणामों को झेल रहां है. लोगों की क्रय शक्ति खत्म हो गई है. दूसरी तरफ प्रधानमंत्री जी के शब्दों में विकास की गंगा बह रही है. विश्व में किसी देश के साथ ऐसा पहली बार हो रहा है.
मोदी जी और ट्रंप ने साथ चलकर दोस्ती का परिचय दिया.
भारत में बैठा विपक्ष पिछले कुछ दिनों से मोदी जी के विश्व गुरु बनने के ख्वाब में अपशगुन कर रहां था. उनके छवि का मजाक बना रहां था.
 कांग्रेसी कहते हैं कि मोदी जी प्रधानमंत्री नहीं प्रचार मंत्री है. चौबीसों घंटे और बारह महीने चुनावी मोड में रहते हैं. सो तो सही है. मोदी जी तो पहले प्रचारक हीं थे. लेकिन कैनवस छोटा था. बस हिंदुत्व का प्रचार करते थे. लेकिन अब कैनवासिंग के लिए उन्हें दूसरे देशों से भी निमंत्रण आ रहे हैं. भाई तुम्हारी क्यों जल रही है? तुम क्यों ढंग का प्रचार नहीं करते? जिन्होंने पार्टी को डुबाया उनको भी तुम अभी तक बाजू हटा नहीं पाए.उलटे जेलों में जाकर उनके गले पड रहे हो. उसमें भी मोदी जी हीं मदद कर रहे हैं. कांग्रेस के एक एक नेता को जेल भेज रहे हैं. अब और क्या चाहिए? यह सफाई तो कांग्रेसियों को ही करनी थी. इतना ही नहीं भ्रष्टाचार में डूबे बचे-खुचे कांग्रेसियों को भी बीजेपी अपनी और खींचकर पवित्र-शुद्ध कर दे रहीं हैं. इस पॉलीटिकल स्वच्छ भारत अभियान का फायदा कांग्रेस को भी हो रहा है. अब कांग्रेस को क्या चाहिए? संघर्ष तो उन्हें नहीं करना है. राहुल-प्रियंका है तो संघर्ष एकदम फालतू बात है.
मोदी जी ने एक तीर में कई शिकार कर दिए है. भारत के चुनावो में लगातार प्रचार करके वे बोर हो गए होंगे. क्योंकि उनके सिवाय बीजेपी के एक आदमी का भी चुन कर आना मुश्किल है. चाहे वह लोकसभा के चुनाव हो या ग्राम पंचायत के, सब तरफ मोदी जी की डिमांड है. मोदी जी ने सही कहा, भारत में सब ठीक चल रहा हैं. लोगों के प्रॉब्लम खत्म हो गए हैं. क्योंकि छोटे से छोटा चुनाव भी लोकल प्रश्नों के बजाय मोदी जी की इमेज पर लड़ा जा रहा है. भारत देश कांग्रेस मुक्त होते होते समस्या मुक्त हो गया है. मोदी- मोदी के नारों ने सबके दिमाग को झकझोर के रख दिया है. कल का नजारा तो ऐसा था कि दुनिया में जहां भी भारतीय लोग बसे हैं वहां मोदी जी को प्रचार के लिए बुलाया जा सकता है. यह मोदी जी के सबसे पसंद का काम है. सारा विश्व मोदी जी को सैल्यूट ठोक रहा है. बड़े-बड़े लोग उनकी सभाओं में शिरकत करते हैं. बस विश्वास की कहां कमी है वह समझ में नहीं आ रहा है. भीड़ तो बहुत इकट्ठी हो रही है. लेकिन पैसा इकट्ठा नहीं हो रहा है. यह कैसी इमेज है हमारी, कि सारे विश्व में हमारा डंका बज रहा है लेकिन विश्वास कोई नहीं कर रहा है. हमारे माल को दुनिया के मार्केट में कोई कीमत नहीं है.भारत में कोई पैसा हीं नहीं लगा रहा है और जो पैसा कमा रहां है वह विदेशों में जाकर बसना चाह रहां है. बस इतनी ही दिक्कत है. बाकी विश्व गुरु तो हम बन हीं चुके हैं.
मोदी समर्थकों के खिले हुए चेहरे देखिए...


गुरुवार, 12 सितंबर 2019

सफेद हाथी बनकर रह गया 'ट्राई' !


तू है तो जीवन है
टीवी के बगैर जिंदगी मुश्किल है. रोटी, कपड़ा और मकान कां नंबर बाद में आता है. लगता है इनके बगैर हम जी लेंगे; लेकिन टीवी नहीं होगा तो हमारी सभ्यता कुपोषित होकर विलुप्त हो जायेगी!

मोदी सरकार के मूँह से निकला हर विचार, सोच एक संक्रामक बीमारी की तरह सबको जल्द हीं घेर लेता है. चाहे वह आम आदमी हो या ब्यूरोक्रेसी; सब उसके चपेट में आ जाता है. ब्यूरोक्रेसी सरकार के आदेशों को इंप्लीमेंट करती है. तो उसके कामकाज पर सरकार का असर दिखना बिल्कुल लाजमी है.

ऐसे ही सरकार से जुड़ी एक संस्था है 'ट्राई' याने टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण). इस ट्राई ने सबको परेशान करके रख दिया है. यह संस्था ग्राहकों पर ऐसे ऐसे प्रयोग कर रही है कि उसके कामकाज का तरीका अब आकलन के परे होता जा रहां है.
इस देश के आधे से ज्यादा टीवी दर्शक अर्ध शिक्षित और अशिक्षित है. यह जानते हुए भी ट्राई के सर्कुलर अंग्रेजी में निकलते रहते हैं. यह लोग इतने भी प्रोफेशनल नहीं है कि ग्राहकों को आसान भाषा में समझा सके.यह FTA मतलब फ्री टू एयर क्या है? इसके तो 154 रु.मंथली टैक्स समेत हर ग्राहक कों लग रहां हैं. फिर यह FTA कैसे हुआ? जिसके भरोसे कमाना है उसे तो यह बातें समझ में आनी चाहिए? जरूरी नहीं है कि इस फिल्ड के टेक्निकल टर्मस् और नये-नये शब्दों कों ग्राहक समझ सके. ग्राहकों में कन्फ्यूजन बने रहने का यह भी एक बड़ा कारण है. यह एक बिझनेस होकर भी ट्राई का व्यवहार बिलकुल 'सरकारी' है; जहां ग्राहकों कि कोई कीमत नहीं है.
ट्राई के मुखियां
 इतने में तो रोजाना सर्कुलर निकल रहे हैं. ट्राई नई नई योजनाएं लाकर ग्राहकों के प्रति चिंता का दिखावा कर रही है; पर वह योजनाएं ग्राहकों के समझ में आए तब ना?

पिछले दिनों में ट्राई ने ऐसे ऑर्डर छोड़े हैं कि उससे सामान्य ग्राहक और नेटवर्क प्रोवाइडर भी परेशान हो गए हैं. एक सिस्टम सेट होता नहीं कि ट्राई का नया सर्कुलर आ जाता है. इसमें नेटवर्क कंपनियों का कोई नुकसान नहीं होता. उन्हें अपने बिजनेस से मतलब है. पहले ही कंपनियों के सैकड़ों पैकेजेस उपलब्ध है. उसे ही लोग समझ नहीं पा रहे हैं और रोजाना नये पैकेजेस आते रहते हैं. ट्राई और नेटवर्क प्रोवाइडर्स ने लोगों को पागल करके रख दिया है. नुकसान सिर्फ आम ग्राहकों कां होता है. नेटवर्क कंपनियां सारा कन्फ्यूजन आम ग्राहकों पर डाल देती है और ग्राहक हमेशा लूटता रहता है.

कुछ साल पहले सेट टॉप बॉक्स कंपलसरी कर दिया गया. तब बॉक्स बनाने वाली कंपनियां और केबल चालकों की चांदी हो गई. आजकल कई घरों में अमूमन दो से लेकर पाँच तक टीवी होते हैं. उतने सेट टॉप बॉक्स लोगों को लगाने पड़े. लेकिन उनकी कीमत पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं था. शुरुआत में तो प्रति सेट टॉप बॉक्स 4 हजार रुपए वसूले गए. अगर कोई ग्राहक सर्विस प्रोवाइडर बदल दे तो सेट टॉप बॉक्स और पैसा भी गया काम से. अभी भी ट्राई ने इस समस्या पर कोई रास्ता नहीं निकाला है.

वह कम ही था कि इस साल फरवरी में ट्राई ने नया सिस्टम लागू कर दिया. सरकार का इनकम बढे और केबल ऑपरेटर्स को लगाम लगे इस के लिए यह कवायद की गई. लेकिन यह सिस्टम कैसे चलेगा, इस पर कोई स्पष्टता नहीं थी. बस ट्राई ने सर्विस प्रोवाइडर पर थोप दिया और उन्होंने आम ग्राहकों को ठोक दिया.
त्रस्त लोग बस चिल्लाते रहते है...
कंपनियों के पास ग्राहकों को समझाने का वक्त नहीं था. उन्होंने हडबड में पैकेजेस बनाएं. ग्राहकों को कुछ समझ में नहीं आया. कई दिनों तक सर्विस प्रोवाइडर के ऑफिस में चक्कर काटकर लोग थक गए. बुजुर्ग लोग और महिलाओं के भी हाल हुये. टीवी बंद होने का डर दिखाया जा रहा था.

बताया जाता कि घर को जा कर अपने पसंद के चैनल्स की लिस्ट बना कर लाओ. लोगों ने रात रात आंखें फोड़ कर लिस्ट बनाई तो फिर उसे स्वीकारने से कंपनियों ने मना कर दिया. क्योंकि हर एक ग्राहक के पसंद के अनुसार लिस्ट बनाना कंपनियों के लिए संभव नहीं था. तो फिर उन्होंने उनके हिसाब से पैकेजेस बनाकर ग्राहकों के सामने रख दिए. उसमें से चुनाव करने के सिवाय लोगों के सामने पर्याय नहीं था. इस कवायद में बिल कम करने का ट्राई का वादा पूरा न हो सका. उलटे चैनल तो कम हो गए और बिल दुगने हो गए. इस चीटिंग की वजह से कई ग्राहकों ने अपने टीवी भी बंद कर दिए है.
तेरे बिन सुनी सुनी है राहें...
कुछ कंपनियां लोगों को नेट पर जाकर पैकेजेस चुनने की सलाह दे रहे थी. ग्रामीण इलाके में अभी भी जवान लड़के छोड़कर बाकी लोग इंटरनेट से उतने परिचित नहीं है. इससे जो कन्फ्यूजन फैला वह आज तक कायम है. उसका फायदा उठा कर कंपनियों ने सबको दुगने बिल के मैसेजेस भेजना शुरू कर दिया.

नया सिस्टम आते ही केबल चालक और ट्राई के बीच में झगड़े शुरू हो गए. यह मामला कोर्ट तक भी गया. आम आदमी के समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था.लेकिन ट्राई कि फेकम् फाक बातोंपर विश्वास रखकर लोक सहते रहें. बिल कम होने का इंतजार करते रहे. यह सब हो रहा था तभी लोकसभा चुनाव आ गए. लोग परेशान थे लेकिन राष्ट्रवाद कि ऐसी आंधी चली कि देशवासियों की असली समस्याएं उस सैलाब में बह गई.

बिल बढ़ गए और चैनल कम हो गए. टीवी ग्राहक रो ही रहे थे कि ट्राई के चेअरमन शर्मा जी ने स्टेटमेंट दे दिया कि 20 परसेंट ग्राहक को के बिल कम हो गए. यह जानकारी उन्होंने किस आधार पर दी थी इसका अभी तक पता नहीं चल पाया है. लोग परेशान होते रहे...

दरमियान सैकडो जागरूक लोगों ने ग्राहकों की समस्याओं से ट्राई को अवगत कराया. ट्राई का टेंशन बढ़ गया तो इतने में उन्होंने फिर एक सर्कुलर निकाला कि नेटवर्क सर्विस प्रोवाइडर्स के पैकेजेस कि समीक्षा होगी. लोगों के बिल कम करने पर विचार होगा. ऐसे ट्राई ने कहां ही था कि कंपनियां सतर्क हो गई. शायद उनके दबाव का ही परिणाम था कि दूसरे पल ही ट्राई अपने वादे से मुकर गई. बताया गया कि कोई बड़ा फेरबदल नहीं होगा अब फिर से ग्राहक सर पर हाथ देकर बैठे हैं.अच्छे दिन के इंतजार में...
ट्राई के ऐसे आर्डर आए दिन निकलते रहते हैं.
यह सरकार कुछ काम करती है और बहुत कुछ फेंकते रहती हैं. ट्राई के अधिकारियों पर सरकार के स्टाइल का कुछ ज्यादा हीं असर दिख रहा है. इस स्वतंत्र सरकारी संस्था का कोई ताल दिख नहीं रहां है. बेचारे भारतवासी केबल वालों की कृपा से जैसे तैसे 200-300 रु.में सारे चैनल देख रहे थे. तकलीफ केबल चालक भी दे रहे थे, लेकिन लोग निभा रहे थे. क्योंकि इतने पैसे में दुनिया भर के चैनल का आनंद मिल रहा था. ट्राई को लोगों की यह खुशी देखे नहीं गई. तरीका वही फेकम् फांक वाला था. नये पैकेज के अनुसार ग्राहकों का कैसा फायदा होगा, सस्ते में चैनल देखने को मिलेंगे, लोगों के पैसों की बचत होगी, जो देखोगे उसी का पैसा देना पड़ेगा, सबके बिल कम होंगे वगैरा-वगैरा बातें करके नई योजना लोगों के माथे पर मार दी गयी. अपना फायदा देख कर लोग भी राजी हुए. जनमानस काफी उत्साहित था लेकिन अब 7 महीने हो चुके हैं और लोग सर पीट रहे हैं. क्योंकि उनके बिल कम होने के बजाय काफी बढ़ गए हैं.

ऊपर से ट्राई के अधिकारी अलग-अलग स्टेटमेंट देकर लोगों को गुमराह करने का काम करते रहते हैं. शुरुआत में ही इस योजना की पोल खुल गई. रेवेन्यू बढ़ाने के लिए सरकार ने यह सब किया लेकिन पूर्व तैयारी ढंग से नहीं हुयी. जैसे नोटबंदी,जीएसटी लाते वक्त भी हुआ था.

जैसे ही लोगों की परेशानी बढ़ती है और वह कंप्लेंट करने लगते हैं उस वक्त ट्राई के अध्यक्ष बाहर आकर कोई नया शगुफा छोड़ देते हैं.और लोग अच्छे दिन आने के आस में लग जाते हैं.

लोगों कां किसी के कमाने को विरोध नहीं है; चाहे वह सरकार हो या उद्योजक. बस सिस्टमैटिकली कमाइए. करोड़ों ग्राहकों को बेवकूफ बनाकर नहीं, इतनी हीं अपेक्षा है. आखरी बात-लोगों को टीवी देखना है और उसके लिए वह खर्चा भी करने को तैयार है. लोग ढंग का रेगुलेशन चाहते हैं. यह जिम्मेदारी ट्राई को सौंपी गई है. उसे वह अच्छे से निभाए. रेगुलेटर कन्फ्यूजन बढ़ाने के लिए नहीं होता. ट्राई के लोग एक बार बैठ कर क्या करना है यह तय कर ले. बार-बार लोगों को परेशान ना करें. काम का दिखावा ना करें. ग्राहकों की समस्याओं को जल्द सुलझाएँ. दिखावे का सफेद हाथी ना बने. सात महीने बीत चुके हैं. कुछ तो करो साईं? सॉरी ट्राई...
अच्छे दिन की आस में मूंह मिठाई किजिए!