सोमवार, 29 जून 2020

योगगुरू स्वामी रामदेव की जय हो...

थोडा रुक जाते तो अच्छा होता
थोडा रुक जाते!
हमारे प्रधानत्री मोदी जी को उनके समर्थको ने विश्वगुरु मान लिया है। दूसरी ओर हमारे बाबा स्वामी रामदेव विश्व में योगगुरु का सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। इसमें पहली बात विवादित हो सकती है, लेकिन दूसरे दावे में बेशक दम है। मोदी जी विश्व गुरू बने हो या नही लेकिन वे योगा के भक्त हैं इस संदर्भ में कोई विवाद नहीं है।

मोदीजी को योगा पसंद हैं और योगगुरू स्वामी रामदेव  मोदी जी को पसंद करते हैं। शायद योगा का ही धागा रहा होगा, इसीलिए दोनो के आपस में अच्छे संबंध है। दोनो में सबसे बडी समानता यह है कि वे माहौल बनाने में माहिर है। लोग दोनों से ही बड़ी उम्मीदें लगाए रखते है क्योंकि उनके सपने और दावे बड़े होते हैं।

दवा मिली, नहीं मिली!

खास तौर पर भारतीय लोगों ने कोरोना की आहट से लेकर अभी तक मोदी जी और बाबा जी से बड़ी उम्मीदें पाल कर रखी थी। लग रहा था दोनों मिलकर इस संकट का रामबाण जरूर निकालेंगे। कुछ जुगाड़ तो होकर ही रहेगा! दोनों के प्रति जुडी श्रद्धा के कारण लोग इंतजार करते रहे। आखिरकार अचानक एक दिन दुनिया को कोरोना की दवा मिल गई, नहीं दे दी गयी। बाबाजी ने अपने जादुई पोतडी से एक कीट निकाल कर दुनिया के सामने रख दिया। डाक्यूमेंट्स का पता नहीं चला और तुरंत दवा का असर उतर गया। विशेष यह हुआ कि मोदी जी की आयसीएमआर ने दवा को पहचानने से ही इनकार कर दिया। इसके कारण बाबा जी की निराशा हुई, यह उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। बडी चीज कां शगून ठीक नहीं हुआ।

कोरोना विश्व के लाखों लोगों को निगल गया है। वैक्सीन के लिए दुनिया अरबों रुपए और समय खर्चा कर रही है। भारत में भी हजारों लोग करोना की भेंट चढ़ चुके हैं और आजतक 5 लाख से ज्यादा लोग उसकी चपेट में आए हैं।  सारी दुनिया उपाय के पीछे लगी है। ऐसे में जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ। बाबा जी ने 15 दिन पहले से ही चैनलों पर योगा के पाठ सिखाना शुरू कर दिया था। तभी कुछ शक हो रहा था कि बाबा कोई धमाका तो नहीं करेंगे? और धमाका हो गया लेकिन पटाखों की आवाज कहीं पर गूंजी नहीं। कुछ पता ही नहीं चला कि किसकी मान्यता लेकर और किस पर प्रयोग चला कर दवाई का दावा किया गया। अच्छा हुआ कि सरकार ने ऐन मौके पर हाथ झटक दिए; नहीं तो सब तरफ से जल्दबाजी का आरोप लगता। बाबाजी तो दावा किया तबसे दिख ही नहीं रहे हैं।

बाबा जी का योगदान

योगा पहले भी था लेकिन बाबा जी ने खुद को उदाहरण बनाकर उसे लोकप्रिय बनाया। उसी माध्यम से पतंजली आयुर्वेद का भी बडा संसार खड़ा किया। शुद्धता की गारंटी देकर  अन्य अनेक खाने पीने की चीजों का उत्पादन वे बड़ी मात्रा में कर रहे है। उसे खास ग्राहक पसंद करते है। उन्हीं की दम पर बाबा जी अपने प्रतिस्पर्धीयोको शीर्षासन करवाने का दम भी भरते हैं। कुछ सेवा प्रकल्प भी वे चला रहे हैं। उनका देश में ही नहीं दुनिया में बड़ा मान-सम्मान है। वे स्वदेशी के वाहक है। कठोर परिश्रम के बल पर योगा और उद्योग कां ऐसा मेल उन्होंने करवाया कि पैसा तो मिला ही, साथ में देश को नई पहचान दिलाने काम उन्होने किया है। शायद उसी से आत्मविश्वास बढा, जो आज ज्यादा ही बढ़ गया है। कोविड का बाजार हथियाने के चक्कर में थोड़ी जल्दी हो गई। जल्दी की तो कम से कम दवा को दुनिया में लाने से पहले उसकी प्रक्रिया और नियमों का पालन करते तो आज हर किसी की जुबां पर उन्हीं का नाम होता।

लेकिन बाबाजी को डरने की जरा भी जरूरत नहीं है। आखिर आयुर्वेदिक दवा ही तो है और चमत्कारी दावों की छूट आयुर्वेदिक के सिवा किसी को भी नहीं दी जा सकती। वैसे बाबाजी के पास एक अच्छी फैसिलिटी है। दवा से बीमारी दूर ना हो तो योगा करो और योगा से फायदा ना हो तो गोली लो, ऐसी सुविधा दूसरे पॅथी में नहीं है। अभी इसे भारत में ही लांच किया गया यह अच्छा हुआ।

योग के माध्यम से भारत के घर-घर में पहुंचने का कर्मयोग बाबाजी साध चुके है। भारत में योगा और आयुर्वेद परंपरा का हिस्सा रहा है। लेकिन उसके प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने का श्रेय नि:संशय रामदेव बाबा को जाता है। योग से साधक को समाधी का आनंद प्राप्त होता है। ज्यादातर संत एकांत और अपनी ही दुनिया में जीने के आदी होते हैं। लेकिन बाबाजी ने योगा के साथ आयुर्वेद का प्रसार प्रचार करते हुए, उसे एक व्यावसायिक प्रतिष्ठा दिलवाने का काम भी किया है। पतंजलि उद्योग समूह के रूप मे एक संत के पुरुषार्थ की नई मिसाल कायम की है। वे फकीर संत नहीं, एक साम्राज्य के धनी हैं।  बस दुनिया में तहलका मचाने का उनका ख्वाब अभी पूरा ना हो सका।

पीछे हटना नहीं

बाबा जी की दवा का असर दिखना अभी बाकी है। 3 दिन में कोरोना का पेशेंट ठीक हो जाएगा यह बाबाजी का दावा है। यह सच हो जाए तो आज बाबा जी जीते जी भगवान बन जाएंगे। कोरोना से मरने वालों का सिलसिला यहीं पर रुक जाएगा।भगवान करे कि उनकी दवा का लोगों पर जल्दी असर हो। डर के इस माहौल से बाहर निकल कर लोग चैन की खुली सांस ले सकें। सभी यहीं चाह रहे हैं। इसीलिए बाबा जी को जरा भी पीछे हटना नहीं चाहिए।

कोविड 19 से दुनिया की तुलना में भारत का थोडा कम नुकसान हुआ है; इसका कुछ श्रेय योगगुरू बाबा रामदेव जी को देना  पड़ेगा। पहले लोगो ने केवल किताबों में हीं योगा देखा-पढां था। गरिबी-अभाव था, लेकिन जो भी खाते उसमे सत्व था। लेकिन वैश्विकीकरण आया, पैसे कां चलन बढां, खान-पान, चाल-ढाल बदली, स्पर्धा आयी, आदमी की स्पिड तेज हो गई, इसलिए तनाव भी बढ़ा। इस के पीछे तरह के डिसीज आये। चारो ओर तरक्की दिखने लगी लेकिन आदमी अंदर से खोखला होता गया।

तरक्की तो दिख रहीं थी लेकिन उसके साथ आयी भिन्न मनो-शारीरिक बिमारियो से लोग त्रस्त थे। सब तरफ स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हुई है, रिसर्च में गहराई आयी है। अरबों का बजेट दुनिया स्वास्थ्य पर खर्चा करती है। लेकिन फिर भी आदमी पागल-बिमार हुवा जा रहां है। ऐसे में किसी गांव से आये बाबा ने लोगो का विश्वास जीतकर उनके बीच योगा की चाह पैदा करवाई। बाद में भूलाए गए आयुर्वेद को मेन स्ट्रीम मे लेकर आए। वहां से बाबाजी का ग्राफ चढ़ता ही गया। अभी बहुत सारे लोग भारत में कई सालों से योगा कर रहे हैं। श्वसन संस्था पर हमला करने वाले कोविड-19 को रोकने में योगा से बढ़ी हुई प्रतिकार शक्ती काम दे रही है। निश्चित ही इसका श्रेय स्वामी रामदेव को भी जाता है।
कुछ करेंगे
रुकना मत

बाबा का ही करिश्मा है कि बडी संख्या में लोग आयुर्वेद को अपना रहे हैं। कई बार आयुर्वेदिक के दावे और उसके प्रतिफल में मेल नहीं बैठता। करोना के इस दौर में आयुर्वेद कुछ कर पाता तो भारत का नाम दुनिया में रोशन हो जाता। चारों ओर से पैसा बरसता तो रोज पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाने की नौबत ना आती!

 अब हम दुआ ही कर सकते हैं कि चीन के साथ बॉर्डर पर गोली ना चले और कोरोना वायरस पर बाबाजी की गोली चल जाए। एक हालात मोदी जी की परीक्षा ले रहे हैं तो दूसरी ओर स्वामी रामदेव की दवा दांव पर लगी है। भारत के लोग बहुत झेल चुके हैं। अब जो भी हो अच्छा हो!






कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें