बुधवार, 8 जुलाई 2020

कोरोना वायरस की त्योहारों पर छाया ! तूम छुपे हो कहां...

चेहरा क्या देखते हो
चेहरा क्या देखते हो...
कोरोना वायरस ने लोगों की जीवनशैली को पलट कर रख दिया है। अभी अनलॉक का दौर चल रहां है। कामकाज रफ्तार पकड़ रहां हैं, लेकिन अनिश्चितता है कि कही फिर से लॉकडाऊन लौट ना आए। गती पकड़ते जीवन में वह जान नहीं है। अपनी ही धुन में तेज रफ्तार दौड़ती हुई दुनिया अब जैसे थम सी गई है। व्यवहार के तौर तरीके बदल गये है।
 अपनी शक्ल पर इतराने वाले आदमी का चेहरा ढक गया है। शक्ल को तरोताजा रखने के लिए लोग जाने कितना खर्चा करते हैं? आदमी, औरतें, युवा लड़के- लड़कियों और बच्चों तक को तरह की चेहरा चमकाने वाली फेस क्रीम की आदत पड़ चुकी है। लेकिन अब उसका यूज नहीं हो रहां है। शक्ल ही ढक रही है तो कौन क्रिम लगाए? फिल्म इंडस्ट्री, मॉडलिंग जैसे फील्ड का तो सारा धंदा ही चौपट हो गया है। ना कुछ फेअर दिख रहा है, ना कुछ लवली!

 हमारे कुछ लोकप्रिय नेता भी महंगे मेकअप करवाते है। लेकिन एक वायरस ने सबको चेहरा छुपाने पर मजबूर कर दिया है। स्वास्थ्य कर्मियों के तो सबसे बुरे हाल है। हमारा आधा चेहरा ढकता है तो दम रुकता है। उनका सारा शरीर घंटो ढका रहता है और कैसे हो पूछने वाला भी कोई नहीं। पिछले कुछ दिनों से इस सेवा से जुड़े हुए डाक्टर भूल चुके होंगे कि कब नार्मल पेहराव किया था। सबके शरीर ढके रहते है। चलो ठीक हुआ कि वायरस के खौफ से फिकी पड़ी चेहरे की रंगत छिप गयी। टमाटर जैसे गालों पर रुमाल ढक गया है। ढके चेहरे से अब केवल आंखें बोलती है। आंखों से जीने की चाह और दर्द भी झलकता है।

तूम छुपे हो कहां...

कोरोना के कारण सार्वजनिक तौर पर मनाए जाने वाले उत्सव बंद हो गए हैं। महाराष्ट्र में कई संस्था संगठनों ने इस
गॉड
साल गणेशोत्सव नहीं मनाने का निर्णय ले लिया है। दुर्गा उत्सव का भी शायद वही होगा। दिख रहा है कि इस वर्ष डांडिया से भी वंचित रहना पड़ेगा। डांडिया होगा भी तो मजा नही आएगा। युवाओं को बडा प्राब्लेम होगा। जिसका चेहरा देखना है उसे कैसे देख पाएंगे?

 महाराष्ट्र में आषाढी एकादशी के पर्व पर लाखो लोग उनके दैवत विठोबा के दर्शन हेतू पंढरपूर जाते है। गाव गांव से 'वारकरी' नाचते गाते 'दिंडी' के साथ विठोबा के दर्शन के लिए महिनाभर पहले ही पंढरपूर कूच करते है। रास्ते में
विठ्ठल
विठ्ठल
'गावकरी' भक्तो की सारी व्यवस्था का जिम्मा लेते है- स्वयंस्फूर्ती से। लाखो लोगो के इस मेले का कोई इव्हेंट मॅनेजमेंट नहीं होता। ना ही पुलिस को ज्यादा दखल देनी पड़ती है। यह अपनी तरह का बडा सात्विक उत्सव है।  अपने आप डिसिप्लीन चलता है। भक्तीभाव का यह पर्व पहली बार हो न सका।

वारकरी बडे दुखी है। वैसे इस उत्सव के पीछे की पौराणिक कथा सबको पता है। आषाढी एकादशी को भगवान सो जाते है। अब भगवान कार्तिकी एकादशी को उठेंगे। फिर वहीं उत्सव होता है। लेकिन शायद उस उत्सव का भी भरोसा नहीं है। अभी तो शुरुआत हुई है। आगे त्योहारों की लड़ी लगने वाली है। एक दुसरे घर खाने-पीने, प्रसाद का मौका चूक जाएगा। पता नहीं त्योहार कैसे मनाएंगे? देशभर घर के चौखट के बाहर अनेक उत्सव मनाए जाते है। कोरोना भी जोरो पर है। रोज के 25 हजार। उसका दायरा फैलता ही जा रहा है। कब रुकेगा यह सब?  क्या भगवान सच में सो गये है?

 भक्तो के उत्साह पर कोरोना की काली छाया पड़ गयी है। कोरोना लोगो की जान और त्योहार भी खाए जा रहां है। इसीलिए लोग में निराशा की
बाप्पा
भावना है। कहां गया भगवान? ऐसे सवाल गुस्से में पूछे जा रहे है। कुछ लोग उसके अस्तित्व पर ही शंका उपस्थित कर रहें है। संकट में दिमाग चलना बंद हो जाता है।

 गलत किया हमने ही। खूब कुत्ते, बिल्ली, चमगाधडो को मारकर खाया। जब वायरस फैला और लोग मरने लगे तब जानकारी दुनिया से छुपाई। गलती आदमी की है और दोष भगवान को देते है। चीनी तो भगवान मानते ही नही। उन्होने कोरोना दिया और उसे अपने देश में फैलने से रोक दिया। हम नियमो का पालन नहीं करेंगे और पकड़ेंगे भगवान को। उसका काम तो ठीक ही चल रहां है। लेकिन ज्यादातर लोग कुछ अलग सोचते है। इस वायरस से जितने लोगों की मृत्यू हुई है वह आंकड़ा दुनिया की आबादी के आगे बिलकुल नगण्य है। दुनिया के लगभग आठ सौ करोड लोग अभी जिंदा है यह किसकी कृपा है, ऐसा सोचकर खूद को पॉझिटिव रखने वालो कि तादात ज्यादा है। भगवान पर शक कर सकते है लेकिन फिर खूद पर तो भरोसा कर ले ?
दिल सच्चा और चेहरा झूठा...
दिल सच्चा और चेहरा झूठा...

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